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________________ समीचीन-धर्मशास्त्र और उसका हिन्दी-भाष्य [सम्पादकीय ] x ४= ==x =x M | | मी समन्तभद्रका 'समीचीन-धर्मशास', जो दिमाग हीट-चने-मिट्टीका होरहा था। भाखिर, २४ अप्रैल x==x लोकमें रनकरण्ड, रत्नकरण्ड उपासकाध्ययन मन सन् १९३६ (अक्षय-तृतीया) को वीर-सेवामन्दिरके उद्घातथा रत्नकाण्डश्रावकाचार नामसे अधिक टनकी रस्म होजाने और उसमें अपनी लायब्रेरी व्यवस्थित प्रसिद्ध है, समन्तभद्रभारतीमें ही नहीं किन्तु किये जानेपर मेरा ध्यान फिरसे उस भोर गया और मैंने समूचे जैनमाहित्यमें अपना नास स्थान और महत्व रखता अनुवाद की सुविधाके लिये इस ग्रन्थके सम्पूर्ण शब्दों का एक है। नैनियोंका कोई भी मन्दिर,मठ या शास्त्रभण्डार ऐसा नहीं ऐसा कोश तय्यार कराया जिससे यह मालूम होसके कि होगा जिसमें इस ग्रन्थरस्नकी दो-चार दस बीस प्रतियों न इस ग्रन्थका कौनसा शब्द इसी ग्रन्थों तथा समन्तभद्रके पाई जाती हों। पठन-पाठन भी इसका सर्वत्र बड़ी श्रद्धा- दूसरे ग्रन्थों में कहां कहांपर प्रयुक्त हुमा है, और फिर उस भक्ति के साथ होता है। अनेक भाषात्मक कितने ही अनु- परस अर्थका यथार्थ निश्चय किया जा सके। क्योंकि मेरी वादों तथा टीका-टिप्पोंसे यह भूषित हो चुका है। और यह धारणा है कि किसी भी अन्धका यथार्थ अनुवाद जबसे मुद्रण-कलाको जैनसमाजने अपनाया है तबसे न जाने प्रस्तुत करनेके लिये यह जरूरी है कि उस ग्रन्थके जिस कितने संस्करण इस प्रन्धके प्रकाशित हो चुके हैं। दिगम्बर शब्दका जो अर्थ स्वयं ग्रन्थकारने अन्यत्र ग्रहण किया हो समाजमें तो, जहाँ तक मुझे स्मरण है, यही ग्रन्थ प्रथम उस प्रकरणानुसार प्रथम ग्रहण करना चाहिये, बावको प्रकाशित हुआ था। अथवा उसकी अनुपस्थिति में वह अर्थ लेना चाहिये जो उस ग्रन्थ के इन सब संस्करणों, टीका-टिप्पणों और अनु ग्रन्थकारके निकटतया पूर्ववर्ती अथवा उत्तरवर्ती भाचार्या दक वादों को देखते हुए भी, नहीं मालूम क्यों मेरा चित्त भर्सेसे द्वारा गृहीत हुभा हो। ऐसी सावधानी रखनेपर ही हम सन्तोष नहीं पा रहा है। उसे ये सब इस धर्मशास्त्रके अनुवादको यथार्थरूपमें अथवा यथार्थताके बहत ही निक्ट उतने अनुरूप मालूम नहीं हुए जितने कि होने चाहिये। रूपमें प्रस्तुत करने के लिये समय होसकते हैं। अन्यथा (उक्त और इसलिये उसमें बर्सेसे यह उधेद-बुन चलती रही है सावधानी न रखनेपर) अनुवादमें ग्रन्थकारके प्रति अन्याय कि ऐसा कोई अनुवाद या भाग्य प्रस्तुत होना चाहिये जो का होना सम्भव है क्योंकि भनेक शब्दोंके पर्थ द्रव्य-सत्रमूल प्रन्यक मर्मका उद्घाटन करता हुमा अधिकसे अधिक काल-भावके अथवा देश-कालादिके अनुसार बदलते रहे हैं. उसके अनुरूप हो। इसी उधेड़-बुनके फलस्वरूप समन्त- और इस लिये सर्वथा यह नहीं कहा जासकता कि जिस भद्राश्रमके देहलीसे सरसावा पाजानेपर, मैंने अनुवाद तथा शब्दका जो अर्थ भाज रूढ है हजार दो हजार वर्ष पहले व्याख्यानके रूप में इस पर एक भाष्य लिखनेका संकलन भी उसका वही अर्थ था। यदि किसी शब्दका जो बर्थ किया था और तदनुसार भाष्यका लिखना प्रारम्भ भी कर प्राज रूढ है वह हजार दो हजार वर्ष पहले रूढ न हो तो दिया था, परन्तु समय समयपर दूसरे अनेक जरूरी कामों उस समयके बने हुए प्रन्धका अनुवाद करते हुए यदि तथा विघ्न-बाधाओंके मा उपस्थित होने और भाष्यके योग्य हम उस शब्दका भाजके रूढ अर्थ में अनुवाद करने लगे यथेष्ट निराकुलता एवं अवकाशन मिल सकनेके कारण वह तो वह अवश्य ही उस ग्रन्थ तथा प्रन्थकारके प्रति अन्याय कार्य भागे नहीं बढ़ सका । कई वर्ष तो बीर-सेवामन्दिरकी होगा। बिल्डिग के निर्माण कार्यमें ऐसे चले गये कि उनमें साहिस्य- उदाहरण के लिये पार्ष(ख)टी' शब्दको बीजिये, सेवाका प्रायः कोई खास काम नहीं बन सका-सारा जिसका रूढ अर्थमाजकल 'धर्त' अथवा दम्भी-कपटी-जैसा
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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