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________________ क्या रत्नकरण्डके कर्ता स्वामी समन्तभद्र ही हैं ? (ले० श्री ५० नाथूराम 'प्रेमी ) रत्नकरण्ड-श्रावकाचार बहुत ही प्रसिद्ध ग्रन्थ है। यद्यपि इसके लिए हस्तलिखित प्रतियोंका कोई प्रमाण यद्यपि उसमे कही भी कर्ताका नाम नहीं दिया है, फिर भी अभी तक उपलब्ध नहीं हुमा है, तो भी, दोनोंको एक परम्परासे यही माना जा रहा है कि प्राप्तमामांसा, वृहत्स्व. साथ रखने पर भी. स्वामी और योगीन्द्रको एक नहीं किया यंभु-स्तोत्र श्रादि के कर्ता स्वामी समन्तभद्र ही इसके कर्ता जा सकता और न उनवा सम्बन्ध ही ठीक बैठता है। इस है । परन्तु वादिराजसुरिने अपने पार्श्वनाथ-चरितके प्रारभमे के सिवाय तीनों श्लोक अलग अलग अपने आपमे परिपूर्ण पूर्वाचार्योंका जो स्तवन किया है उससे मालूम होता है कि हैं, वे एक दूसरेकी अपेक्षा नही रखते, तीनों में एक एक दोनों एक नहीं हैं। वे कहते हैं प्राचार्यकी स्वतंत्र प्रशस्ति है। स्वामिनश्चरितं तम्य वस्य नो विम्मयावहं । एक बात और भी ध्यान देनेकी यह है कि वादिराजने देवागमेन सर्वज्ञो येनाद्यापि प्रदर्श्यते ॥१७ श्लोक नं० १६ से ३० तक १५ श्लोकोंमे पूर्ववर्ती १५ ही अचिन्त्यमहिमा देवः माऽभिवन्द्यो हितपणा। प्राचार्योका या कवियोका स्मरण किया है. अर्थात् प्रत्येकके शब्दाश्च येन सिद्धयन्ति माधुत्वं प्रतिभिताः॥१८ लिए उन्होंने पूरा पूरा एक ही श्लोक, अपने आपमें सम्पूर्ण त्यागी म एव योगीन्द्रो येनाशय्यमुग्यावहः। दिया है। कही भी इस क्रमको भंग नहीं किया है । तब अर्थिने भव्यमार्थाय दिष्टो रत्नकरण्डकः ।।१६ उक्त दो श्लोकों में एक ही समन्तभद्रकी स्तुति की होगी, इन तीन श्लोकामे 'स्वामी', 'देव' और 'योगीन्द्र' इन यह नहीं हो सकता। नीन पृथक पृथक प्राचार्योकी स्तुति की गई है। इनमसे जिस तरह 'स्वामी' नाम नही है उपपद है, उसी पडले 'स्वामी' तो समन्तभद्र हैं जो देवागम (प्राप्तमीमांसा) तरह योगीन्द्र भी नाम नहीं है। असली नाम रनकरराटक के कर्ना हैं । और भी अनेक विद्वानांने इन्हें स्वामी शब्दमे कर्ताका भी समन्तभद्र हो सकता है, जो स्वामी समन्तभद्र म्मरण किया है। दूसरे देव जैनेन्द्र व्याकरणके कर्ता देव- से पृथक् शायद दूसरे ही समन्तभद्र हो। नन्दि हैं और उन्हें उनके नामके एक देशसे उहिखित किया यह स्मरण रखना चाहिए कि वादिराजसूरिने पार्श्वहै। कहा है कि जिनके द्वारा शब्द साधुताको ग्रहण करके सिद्ध नाथ चरित शक सं० ६४७ (वि० सं० १०८२) में समाप्त हो जाते हैं, वे अचिन्ननीय महिमा वाले 'देव' बन्दनीय हैं। किया या, और वे बड़े भारी विद्वान थे। उनके समक्ष अवश्य ही ये शब्दशास्त्रके कर्ता देवनन्दिही हैं। तीसरे श्लोक अवश्य ही देवागमके कर्ता और स्नकरण्डके कर्माको के 'गोगीन्द्र अक्षय मुम्बके दाना 'नकरण्ड' के का है। पृयश्वका कोई प्रमागा या कोई अनुश्रति होगी और इस तीनामें कथिाक स्पष्ट पुरे नाम न देकर सकेन या उनके लिए जब तक उनके पदलेका दानाकी एकताका कोई दूसरा विशेषण दिये हैं. फिर भी गुगा गणनमे व स्पष्ट हो जाते हैं। प्रमाण न मिल जाय, तब तक उनके कथन पर एकाएक तीनी श्लोक अलग अलग नीन ग्रन्थकर्ताओं का स्मरण अविश्वास नहीं किया जा सकता। करते हैं और साथ ही उनके प्रथाका संकेत | बीच में देव. *स्व० गुरुजी (पं. पन्नालाल बाकलापाल) ने जयपरके नान्द : अनएन पहना और तीसरे श्लोकमे स्मृत 'स्वामी' ग्रन्यमंडागेके ग्रन्या के कुछ प्रारंभिक अंश और अन्यऔर योगीन्द्र' एक नहीं हो सकते। यदि यह कल्पना की प्रशस्निया भेजी थी उनमें वादिगज कृत पाश्वनाथ-चरिन जाय कि पहले इलेकिके बाद ही तीसरा श्लोक होगा, का प्रारंभिक अंश भी है। उममें उक्त तीन श्लोकोका बीचका श्लोक गल्तीये तीसरेकी जगह छप गया होगा-- वही कम है, जो मा० अ० मानाकी छपी हुई प्रतिम है।
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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