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________________ साहित्य-परिचय और समालोचन १ षट्खण्डागम (धवला टीका हिन्दी अनुवाद यशपाल जैन बी. ए. एल. एल. बी. कुटेश्वर । प्रकासहित)-मूल लेखक, भगवान पुष्पदंत भूलबली। टीका- शक, प. नाथूगमजी प्रेमी मालिक हिन्दी ग्रंथ रत्नाकर कार प्राचार्य वीरसेन । सम्पादक, प्रो. हीरालालजी जैन कार्यालय हीराबाग, बम्बई नं.४। पृष्ठ संख्या १८।। एम. ए. अमरावती। प्रकाशक, श्रीमंतसेठ सितावराय मूल्य, चार श्रीसू। नचमीचद जैन साहित्योद्धारक फंड, अमरावती । पृष्ठ संख्या प्रस्तुत पुस्तक स्वर्गीय हेमचन्दजी मोदीके संस्मरणों ५६६ । मूल्य सजिल्द प्रति १०) शास्त्राकारका १२)। और उनके जीवन परिचयके रूप में प्रकाशित हुई है। इस ___ यह षट् खण्डागमके जीवट्ठाण नामक प्रथमखंडकी की प्रस्तावनाके लेखक पं० बनारसीदासजी चतुर्वेदी हैं। छठी पुस्तक है। इसमे उक्त खंडकी नौ चूलिकामोंको दिया हेमचन्द्र कितना योग्य विद्वान, गम्भीर विचारक और स्पष्ट गया है जिनके नाम इस प्रकार हैं-१ प्रकृतिमयुरकीर्तन, वादी था. यह बात उसके साथ सम्पर्क रखने वाले मनन २ स्थानसमुत्कीर्तन, ३ प्रथमदंडक, ४ द्वितीयदंडक, तृतीय तो जानते ही हैं किंतु ओ लोग उसके इन संस्मरणों और महा दंडक ६ उत्कृष्ट स्थिति ७ जघन्य स्थिति ८ सम्य- संकलित पत्रोंको पढ़ेंगे वे भी उमसे परिचित हुए बिना न क्योपत्ति है और गत्यागति । इन चूलिकाओंका संक्षिप्त रहेंगे। इस पुस्तकमे ४ लेख या सस्मरण विभिन्न विद्वानी परिचय 'विषय-परिचय' शीर्षकके नीचे प्रस्तावमामें दिया द्वारा लिखे गए हैं, प्रत्येक लेखकने हेमचद्रके व्यक्तिवके विषय गया है। मे प्रकाश डालनेका प्रयत्न किया है और कुछ लेम्बकोंको छोड़इस पुस्तकका अध्यन करनेसे सम्यक्त्यके सम्मुख जीव कर सभीने उसकी स्पष्ट वादित्ताको स्वीकार किया है । प्रेमी की परिणति, उसके कर्मबन्धादि, तथा सम्यक्त्वकी उत्पत्ति जीके लेखकी घटना तो उसके स्पष्टवादी होनेका और भी किस प्रकार होती है और उसके परिणामोंमे उत्तरोत्तर समर्थन करती ही है। प्रेमीजाके लेखको पढ़कर असमय में कितनी विशुद्धि निरंतर बढ़ती रहती है इसका विशद हुई पुत्र-वियोग जन्य वेदना की एक टीम हृदयमें घर कर वर्णन श्राचार्य वीरसनने किया है। साथ ही कर्मोपशमना जाती है और उससे प्रेमीजीकी इस वृद्धावस्थामें सहसा और क्षपणाका विधान भी रुचिकर दिया हुश्रा है। उमगे बापरे दुःखका अन्दाजा लगाया जा सकता है। हेमचन्द्रकी इसकी प्रमेय बहुलताका पता सहज ही लग जाता है। मौलिक साहित्यके निर्माण की भावना कितनी उच्च और पिछले खंडोंकी अपेक्षा स्वाध्याय प्रेमियोको इस खडके साहित्यिक जगतमे क्रान्ति लाने वाली थी यह उनके कतिपय अध्ययन और चिंतनमें तथा प्राचार्य नेमिचक्र लब्धिसार- सजनाको लिखे गये परोसे स्पष्ट जानी जाती है। प्रेमीजी सपणासारको सामने रख कर तुलनात्मक दृष्टिसे अध्ययन यदि हेमचन्द्रको उत्साह दिलाते तो बहुत मभव था कि वह करनेसे विशेष रस पाये बिना न रहेगा। अनुवाद अच्छ। अपने इतने अल्प जीवन में ही जगतके लिये अरछे विचारहुना है. और विशेषार्थों द्वारा विषयको और भी स्पष्ट कर पूर्ण माहित्यको स्पष्टी कर जाता। अब तो जितने साहित्य दिया गया है। ग्रंथके अंतमें ६ निम्नपरिशिष्ट दिये हुए हैं। का वह निर्माण कर गया है उसी पर संतोष करना होगा। सूत्र पाठ२ अवतरण गाथा सूची३ न्यायोक्तियां४ ग्रंथोल्लेख यह जान कर प्रसन्नता हुई कि प्रेमीजी हेमचन्द्र के सभी २ पारिभाषिक शब्द-सूची ६ विशेष टिप्पण । इनसे प्रस्तुत साहित्यको प्रकाशित करेंगे। इस पस्तवका प्रकाशन, अच्छा प्रथकी उपयोगिता अधिक बढ़ गई है। छपाई सफाई सभी हाई और वह इतने गंचा टगमे यकलिन हुई है कि पूर्ववत् है, ग्रंथसंग्रहणीय और पठनीय है। जो भी व्यक्ति से पढ़ेगा वह हेमचन्द्र के लिये चार सामू २ स्वर्गीय हेमचन्द्र-सम्राहक और सम्पादक, वा० बहाये बिना न रहेगा। परमानन्द जैन शास्त्री
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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