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________________ समन्तभद्रका एक और परिचय-पद्य [ सम्पादकीय ] स्वामी ममन्तभद्र के प्रात्म-परिचय-विषयक अभी तक श्राचार्योहं कविरहमहं वादिराद पंडितोहं दो ही ऐम पद्य मिल रहे थे जो रानसभायोंमें राजाको दैवज्ञोहं भिषगहमह मांत्रिकस्तांत्रिकोहं । मम्बोधन कर के कहे गये है-एक 'पूर्व पाटलिपुत्रमध्यनगरे ___ राजन्नस्यां जलधिवलयामेखलायामिलायाभेरी मया नाडिना'* . मका है, जो करहाटकको गनसभामें आज्ञःसिद्धः किमिति बहुना सिद्धमारस्वतोहं ॥३॥ अपनी पूर्ववाद-घोषणााका उल्लेख करते हुए कहा गया इस पद्यमे वणित प्रथम तीन विशेषण-श्राचार्य, था और दूमग 'काच्या नग्नाटकादं'। इम वापसे प्रारंभ कवि और वादिराट--तो पहलेमे परिज्ञात हैं-अनेक पूर्वाहोता है जो किमी दूसरी राजसभामे कटा हुअा जान पटना चार्योके वाक्यों, ग्रन्यो तथा शिलालेग्योम इनका उल्लेख है और जिसमें विभिन्न स्थानोपर अपने विभिन्न माधुवेषोका मिलना है। चौथा 'पंडित' विशेषण अाजकल के व्यवहार उल्लेख करते हुए अपनेका जैननिHथवादी प्रकट किया है में 'कवि' विशेषरणकी तरद भले ही कुछ माधारण ममझा और माथ ही यह चैलेंज किया है कि जिम किसी की भी जाता हो परन्तु उस समय काबके मुख्यकी तरह उमका भी वाद की शक्ति हो वह मामाने श्राकर बाद बरे। बड़ा मूल्य था और वह प्राय: गमक ( शास्त्रोके मर्म एवं हालम समन्तभद्र-भारतीका मशोधन करते हुए, रहस्यको ममझने और दूमरीको समझानेम निपण ) जैसे स्वयमस्तोत्र पाचन प्रतियोको खोनम, मझे देहलाके विद्वानोके लिये प्रयुक्त होना था । भगवा जनसेनाचार्यने पंचायती मन्दिरम एक ऐमा निजाम्-शार्ग गुटका मिला ग्रादि पुराण में मभन्नभद्र के यशको कवियो, गमको. वादिया है जिसके पत्र उलटने पटने दिकी जरा मी भी श्रमाव- और वाग्मियों के मस्तकका चूनामरिण बतलाया है + और धानीको मदन नहीं कर सकते। इस गुट केके अनगिन सयंभ हमके द्वारा यह मचिन किया है कि उम ममय निनने कनि स्तोत्रके अन्नग उक्त दानी यथाक्रम पद्यों के अन्तर एम. गमकनादी और वाग्मी थे उनमबार समन्तभद्र के यशकी छाया तीमरा पद्य और मगृत है, जिमग स्वामीजीके पारचय- पड़ी हुई धी-उनमे कवित्व, गमकत्व,वादिव और वाग्मिल विषयक दम विशेषग उपनगदत है और वे है- नामके ये चारो गुण असाधारण काटिके विमामको प्रान हुए थे, १ श्राचार्य, २ कवि, ३ वादगट , ४ पण्डित, ५ दैवज और इसलिये पंडित विशेषण यहो गमकत्व में गंगा (ज्योतिर्विद , ६सय दि) ७ अन्त्रिा. (भत्रतिशेषन), विशेषका गोतक है। शेष मब विशेषण इस पयर द्वारा प्राय: ८ तान्त्रिक (नंशेिषज्ञ), प्राशामा और मिड- नये ही कामे पार हैं और उनमें ज्यातिप, वैद्यक, मत्र सारस्वन । १८ पय :म प्रकार है : और तत्र जेम विषयोमे भी ममन्तभद्र की निपणताका पता * पूर्व पाटापत्रमध्यनगर भेग मया ताडि चलता है । रत्नकरण्डश्रावकाचारमे अंगहीन सम्यग्दर्शनको पश्चानमाल समन्धुटक्कानपये काचीपर बदिशे। जन्मान्त तक छेद में असमर्थ बत नाते हुए, नो विषवेदना प्राप्तोऽहं करहाटक बहुमट चिोकटं संकटं, के दरनेम न्यूनाक्षरमंत्रकी अममर्थताका उदाहरण दिया है वादार्थी विचराय नपत ! शार्दलावक डिम वह और शिलालेग्नी तथा ग्रन्याम 'स्वमत्रवचन-व्याहनकाच्या नग्नाटकोऽदं मलमालनगनुर्नाम्बुशे पाण्डुनि:: देखो, बार मेवामन्दिरसे प्रकाशिन 'मत्माधुम्मरगामंगलपाठ' पुण्ड्रोई शाक्यभिक्षुर्दशपर नगरे मृ(भिष्टभोजी पारबा। में स्वामिसमन्तभद्र स्मरण'। वाराणस्यामभूव शशि(श)धरधवल: पाण्डुरांगस्तपस्वी, + कवीना गमकाना च वादीना वाग्मिनामपि । राजन् ! यस्यास्ति शांत: मरदतु पुरतो जैना..प्रथवादी॥ यश: सामन्तभद्रामि मूनि चूडामणीपते।
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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