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________________ किरण ३-४] जैनधर्मकी चार विशेषताएँ ही अधिक पूज्य होगा। भले ही वह किसी जाति अथवा सूत भी रखना पाप बताया है। जिस प्राणीका अन्तरङ्ग किसी योनिका क्यों न हो? बाबा पदार्थोसे जितना अधिक ममता-रहित होता जावेगा करणानुयोगमें द्रव्यलिंगी मिथ्याष्टि मुनिकी अपेक्षा वह उतना ही अधिक परिग्रहका त्याग करता जायेगा। सम्यग्दृष्टि तिर्यञ्चको अधिक मूज्य बतलाया गया है। व्य. याप पूर्ण अपरिग्रह मुनि अवस्थामें ही हो सकता है तो लिङ्गी सुनिके जहां बन्धयोग्य समस्त कर्मप्रकृतियोंका भी उसका यह अर्थ नहीं है कि हम गृहस्थाको उसका कुछ प्रास्रव होता है वहां अविरतसम्यग्दृष्टि तिर्यमके भी परित्याग नहीं करना चाहिये । जो पूर्ण परिग्रहका त्याग प्रकृतियोंका पासव रुक जाता है। जैनधर्मका यह प्रमाणित नहीं कर सकते ऐसे गृहस्थोंके लिये भागोंने परिङ्गहसिद्धान्त है कि संसारका प्रत्येक प्राणी 'ग्रामहित-साधनमें परिमाण भगुवतका उपदेश दिया है। स्वतन्त्र है। हम स्वय पुरुषार्थके द्वारा अपने प्रारभाको परिग्रहपरिमाण व्रतका सच्चा रहस्य यह है कि किसी समुन्नत बना सकते हैं और प्रालस्य-अकर्मण्यताय श्रव को आवश्यकतामे अधिक परिग्रह-धनसम्पत्तिका स्वामी नत बना सकते हैं । यही दृष्टि हृदयमे रख कर कहा गया है नहीं बनना चाहिये । जैसे शरीर में एक जगह मावश्यकतासे कि 'पारमा ही प्रामाका बन्धु है और प्रारमा ही प्रामाका अधिक रक्त रूक जानेस शरीरकं अन्य भङ्ग निविष्य होजाते शन है'। इस प्रकार हम देखते हैं कि जैनधर्ममे प्रारम- हैं उसी प्रकार एक जगह आवश्यकतासे अधिक रुक जानेसे स्वातन्त्र्य पर जितना जोर दिया गया है उतना अन्य धर्मों ससारके अन्य प्राणी उसके बिना निस्क्रिय हो जाते हैं। मे नही दिया गया है। वहाँ या तो सब कुछ ईश्वरके हाथ जिम प्रक र रक्तका श्रावश्यक संचार होते रहनेसे ही शरीर मे सोंप दिया गया है या फिर ईश्वरका बहिष्कार ही कर की व्यवस्था ठीक रह सकती है उसी प्रकार परिग्रह-धन दिया है। सम्पदाका श्रावश्यक सगर होते रहनेसे ही संसारके समस्त ४ अपरिग्रहवाद लोगोंकी व्यवस्था ठीक रह सकती है। इसके सिवाय परिऊपर बतलाया गया है कि परिग्रह रागद्वेषकी उत्पत्ति. ग्रहका परिमाण र ले नेसं इच्छाभोंकी उद्दाम प्रवृत्ति रुक का कारण है और राग-द्वेषका उत्पन्न होना ही हिमा है, इस जाने के कारण तत्काल ही प्रानन्दका अनुमय होने लगता लिये जो सच्चा अहिंसक बनना चाहता है वह परिग्रह के है। भाजके साम्यवादकी जद मे जैनधर्मका यह अपरिग्रहसंपर्कमे नर रहे। परिग्रहका श्रर्थ है पर पदार्थोंमे ममता वाद ही पानी दे रहा है। भाव । इमीको कहते हैं मूछी । शान्त बिच विचार करने भगवान् महावीर स्वामी के द्वारा प्रवाहित जैनधर्ममें पर यह परिग्रह ही दुबका कारगा मालूम होता है। इसी यही प्रमुम्य विशेषताए हैं जो भाकीय इतर धर्मोंमे इसका लिये जैनधर्ममे इसके छोडनेका अधिकमे अधिक उपदेश पृथक और उच्च स्थान बनाये हुए हैं। दिया है। इतना अधिक, कि मुनि अवस्थामे शरीर पर एक वमन्त कुटीर, मागर संशोधनकी आवश्यक सूचना भाई कौशनप्रमाद के स्पष्टीकरगा' नामक वक्तर से अन्यत्र प्रकाशित है मालूम हाकि प्रमाचन्द्र क तत्वार्थस्त्रकी प्रस्तावनामे जो कोटा' वगा है वह गलत उम के स्थानर बूदी' 'ना चाहिये। अत: जिन मजनोंक पाम उक्त तत्वार्थसूत्रकी कोई प्रति हो उनमे निवेदन है कि वे अपनी उम प्रतिको प्रस्तावनाके ७ व पृष्ट पर २० वी पंक्ति में दो जगह और 4 वें पृष्ठकी ४ था पंक्ति में एक जगह पर जहां कोटा छपा हे बदा 'बूंदा' बना लेनेकी कृपा करें। सम्पादक
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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