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________________ अनेकान्न वाम वैरको पीछे कर लेता है और वाम देश्मे ख दक्षिणको पीछे कर लेना है परन्तु दोनों कैस आवश्यक है | वह दोनों पैरों एक साथ भी नही चल सकता और न एकको निष्क्रिय कर सिर्फ दूपरसे ही चल सकता है। इसी प्रकार पदार्थ निरूपण मे हव्यदृष्टि और पर्यायदृष्टि आदि अनेक दृष्टियों काम करनी हैं। यह अनेकान्त जीवन के प्रत्येक क्षण में काम चानेवाला सिद्धान्त है। इसके विना मानवका एक क्षण भी काम मडी चल सक्सा, इसलिये इसका वास्तविक स्वरूप समझ कर उसे जीवन घटिन करनेका उद्योग करना चाहिये। यदि हम अनेकाका ठीक ठीक स्वरूप समतो परस्पर की तू-तू मैं मैं भी ही शान्त हो जाये । हम आपके दृष्टिकोणको मम और आप हमारे दृष्टिकोयाको समझ जं तथा उनका उपयोग अपनी अपनी आवश्यकताथोके ऊपर छोड़ दें तो विरोध ही क्या रह जाता है ? हमारा तो विश्वास है कि जैसी अनेकाला भाविर्भाव इमी लिये किया है कि सबके सब मित्र रहे सब सबके दृष्टि - जैनधर्मकी विभेदको मममनेकायन करें। धर्म , 1 तर बौद्धधर्म भी वैराग्यप्रधान धर्म है। उसने वैराग्यका प्रतिपादन करनेके लिये आसक्तिका अभाव करनेके लिये मारके प्रत्येक पदार्थको अनित्य माना है और सांख्यधर्म ज्ञानप्रधान धर्म है। उसने थामा और परपदार्थका -- पुरुष और प्रकृतिका ठीक ठीक विश्लेषण कर उनका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने उपदेश दिया है। इसलिये प्रत्येक पदार्थको निष्य मानना है बड़ा अभिप्राय पर्या 1 है और साख्यका अभिप्राय द्रव्यदृष्टिसे है । एकान्त ठ पत्र जानेसे दोनो एक दूसरे विश्व हो जाते है परन्तु जैन धर्म द्रव्य और पर्याय दोनों धनीको अपनाकर दोनों का समन्वय कर देना है । वाग्नयमे यह श्रनेकान्ती जैनागमका जीव है-प्राण है और समन विरोधी दूर करनेवाला है। परमागमस्य जीवनपद्धजा पन्धमिधुरविधानम् । सफल नवलसिताना निरोधमयनं नमान्यनेकान्तम् । गुरुणामिव गये अमृतचन्द्राचा [ वर्ष ७ ३ स्वतन्त्रता जैन धर्मकी तीसरी विशेषता है स्वतन्त्रता । जहां धन्य धर्मो जीवको प्रत्येक कार्यमे- निर्वाण प्राप्त करनेमें भी ईश्वरके परतन्त्र माना है वहां जैनधर्ममें जीवको स्वतन्त्र माना है । यहाँ इस बातकी घोषणा की गई है कि संसार सभी प्राणी जीवम्व नावे समान है। संसारका प्रत्येक प्राणी 'सच्चिदानन्द बन्द' है। जो जीव आज निगोद पर्याय में रह कर एक श्वासमे अठारह वार जन्म मरणकं दुख उठा रहा है वही कालान्तर में अजर अमर हो स परमेष्ठी हो सकता है। जैनधर्ममं जीवके बहिगमा अन्तरात्मा और परमात्माक भेदमे तीन भेद बतलाये गये हैं। जो जीव और शरीरको एक ही मानना है- शरीरको ही श्रात्मा मानता है-वह बहि रामा है। जो आत्मा और शरीरको भिन्न भिन्न अनुभव करना है वह अन्तरात्मा है और जो कर्ममलको नष्ट कर उत्कृष्ट अवस्था प्राप्त कर लेता है वह परमात्मा कहलाता है। जब कि अन्य धर्मो परमात्माकी मत्ता अलग मानी गई हैन जैनधर्ममे यह बताया गया है कि बदमा जीव ही अपनी सतत माघनामे श्रन्तरामा बनता है और वही कर्मावरण दूर होने पर परमामा बन जाता है। इस परमात्माके सिवाय जैनधर्म किसी अन्य ईश्वरकी सत्ता स्त्रीकृत नहीं करता । जैन शास्त्रों धर्म पार कर सकते हैं की बार सभाओमे देव देवियों तथा मनुष्य और महिलायोंके लिये स्थान दिया गया है वहीं पशुपक्षियोंके लिये भी स्थान दिया गया है। प्रकार राम-दिन जिस सुख शान्तिवदेन सम्यग्दर्शन धारण कर सकते हैं उसी प्रकार रात दिन मारकाटके बीच रहने वाले सप्तम नरक्के नारकी भ) सम्यग्दर्शन धारण कर सकते हैं। जैनधर्म समारा धर्म है। वह किसी प्रमुख जाति अथवा योनिके श्राधीन नहीं है। प्रत्येक प्राणी अपनी योग्यता के अनुसार धारण कर इसमें लाभ उठा सकता है। जैनधर्मका र सिद्धान्त है कि गुण पूजाके स्थान है' । जिम लामामे जितने अधिक गुण विकसित होंगे वह उतना है कि पशु पक्षी भी भगवान्के
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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