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________________ किरण ३-४ ] जैनधर्मको चार विशेषताएँ २३ माद स्नेह भी रखता है। उक्त उल्लेखसे मालूम होता है स्वीकार कर हम उसके शेष धर्मोंका अस्तित्व स्वीकार कि वह कसाई भी स्वकीयभाव-अहिंसाको छोड़ कर अन्य न करें तो ऐसा करनेसे उस वस्तुके पूर्ण स्वरूपका औपाधिक भाव निरन्तर नहीं रख सकता। प्रतिपादन नहीं किया जा सकेगा और उस अपूर्ण प्रतिपादन ___ सच्चा प्रात्मस्वभाव होनेके कारण प्राचार्योंने अहिंसा से संसारके प्रत्येक प्राणीको लाभ भी नहीं हो सकेगा। को ही परमब्रह्म माना है * । परन्तु जहां पर पदार्थोके साथ जीव निस्य भी है और भनित्य भी। परन्तु जब कोई मम्बन्ध--रागद्वेष है वहां अहिंसा स्थिर नहीं रह सकती, साधक सल्लेखनाके समय भूख प्यास प्रादिकी बाधामोंसे इसलिये जैनधर्ममें बाह्य पदार्थों मे सम्बन्ध छोड़ कर दुग्वी होकर अपने आपको मरणोन्मुख जान दुखी होने निष्परिग्रह होने का उपदेश दिया गया है। जैन धर्म में एक लगता है तब उसे स्वकीय यतमें स्थिर रखने के लिये उपअहिंसाको ही मुख्य धर्म माना गया है। शेष सत्य, अस्तेय, देष्ट। जीवको नित्य मानकर उपदेश देता है कि हे प्रामन् ! ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह आदि जितने धर्म है वे सब इसीके तू अजर है, अमर है। इन शारीरिक यातनामोंसे तेरी परिकर है- इसीके रक्षक हैं और अपत्य प्रादि हिंसाके कभी मृत्यु नही हो सकती। हां, शरीर भले ही नष्ट है। विस्तार हैं+ । इसके मिवाय जितनी कुछ व्रत विधान प्रादि सकता है परन्तु यह तेरा है कहाँ? और जब कोई पुरुष की व्यवस्था की गई है वह सभी राग द्वेष घटा कर सच्ची अपने पापको स्थायी मानकर तरह तरह के अत्याचार करने अहिंसा प्राप्त करनेके उद्देश्यसे ही की गई है। प्रत्येक प्राणी लगता है तब उसे उपदे। समझाते हैं कि 'रे मानव । का नव्य हो जाता है कि वह इस यथार्थ अहिंसाका समारमें एकसे एक बढ़ कर हो गये परन्तु अाज तक कोई स्वरूप समझकर उसे ही प्राप्त करनेका प्रयत्न करे। क्योंकि भी स्थिर नहीं रह सका: फिर तू तो होक्या?क्यों इस जैन शास्त्रोमे यह रगष्ट बतलाया गया है कि जो इस थोड़ी सी जिन्दगीमें इतना अत्याचार करता है। यदि अहिमा वीतराग परिणतिको न समझकर केवल शरीराश्रित जीवको निप्य या अनित्य ही मानकर एकही दृष्टिसे दोनो क्रियाकाण्डमे ही उलझा रहता है वह व्यलिङ्गी है और के सामने प्रतिपादन किया जाता तो दोनोंको लाभ नही उपकी वे समस्त क्रियाएँ संसारका ही कारण हैं। हो सकता था। इसमे मालूम होता है कि बस्नुके भीतर अहिंसाके इस लक्ष्यविन्दु तक पचनेके लिये अनेक गुण हैं परन्तु अपनी अपनी विवक्षासे उन सबका श्राचार्याने हमारे रहन सहन, आचार विचार प्रादिको निरूपण किया जाता है। जहां अनेकान्त अन्य धर्मोको अनेक विभागाम विभाजित किया है। उसे लक्ष्यका साधन अनर्पित या गौण मानता है नहीं अन्य एकान्त मत उम समझकर उसके अनुरूप प्रवृत्ति करनी चाहिये । यहो उन समय उनका अभाव ही मान लेते हैं। यही कारण है कि सब विभागोंका वर्णन विस्तारभयसे हम लोद रहे हैं। उनके द्वारा प्रतिपादित वस्तु अपूर्ण रह जाती है। नीबू खट्टा भी है, सुगन्धित भी है और है पीला भी। २ अनेकान्त उसमें चार धर्म हैं । यद्यपि भोजन के समय में सिर्फ उस अन्त :दका अथ धर्म या गुण है। प्रत्येक पदार्थमें के खनको प्रावश्यकता है और जी मचलानके सम्य अनेक धर्म रहा करते हैं। उन सभी धमाका योग्य समन्वय सगन्धित होनेवी। परन्त इसमे यह नहीं कहा जा सकता के साथ अम्तिाव प्रतिपादन क ना ही 'अनेकान्त' कहलाता कि नीबू में भोजन के समय खट्टेपनको छोड़ कर और कोई है। यदि अनेक धर्मवाली वस्तु के किसी एक खास धर्मको गण नहीं है। हैं अवश्य, परन्तु अावश्यकता न होने * अदिमा भूताना जगति विदित ब्रह्म परमम्' उन्हें गौण कर दिया जाता है । नयवादसे एक समय में -स्वयंभूपत्र ममन्तभद्रस्य एक पदार्थका एक ही धर्म कहा जा सकता है परन्तु उस अात्मपरिगामहिमन द्वेतुत्वात्मवमवास्मिनत् । समय दूसरे धर्मका प्रभाव नहीं मानना चाहिये और नहीं अमृतवचनादिवे बलमुदाहृतं शियबोधाय ।। दोनों धर्मों परस्परमें निरपेक्ष होकर वर्णन करना चाहिये। -पुरुषार्थमिद्धय पाये श्रम चन्द्रस्य मनुष्य दो पैरोमे चलता है, वह दक्षिण पैरपे चलते
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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