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________________ अनेकान्त [ वर्ष ७ और सभी उमने देखा--हाथियों का झुण्ड भागा जा काजल सा काला शरीर था। सुर्व आंग्वं, बडी नाक रहा है, पीछे बाघ दहाड़ रहे हैं । अनेक पेड़ उखड़ते और मोटे-मोटे मोठ थे। हाथ-पांव भी सुन्दर नहीं थे। जा रहे हैं! बाल-सफेद हो चले थे। करीब-करीब बृढा ही था । पर "कितनी भयंकर अटवी। यह ?'-काँपते स्वरमे था मजबूत ! - चन्दनाके मुंहये निकला। चन्दनाने अपने राज्य शौर्यको काममें लाना चाहा। वह रो रही थी--अपने दुर्भाग्यपर ! और मोचती जा किन्तु वह इसमें कृतकार्य न हो सकी, दयनीय परिस्थिनिने रही थी -'यहांमे किम तन्ह निकला जाय ? निकला जाय! उसे विवश कर दिया। उसके मुहम निकला -- बाबा । भयमे कोप रही थी। शरीर दुर्बलता अनुभव कर रहा हिंसक जन्तुकी नरह देखता रहा, वह---एक टक । था, जैसे लम्बी बीमारीसे उठी हो। वह उठकर खडी हुई, फिर बोला--'क्या कहती है--छावरी । मैं विरातदो कदम आगे बटी भी । अनायास उसकी दृष्टिके पथपर मरदार हैं।" वह दृश्य पाया कि वह वही चीख मारकर बैठ गई। चन्दना स्तंभित रह गई । वह मनती पा रही है कि श्रॉम्ब मींच ली। भील-जाति कितनी नृशंम, कितनी क्टोर. कितनी असभ्य एक मोटा ताजा अजगर राम्तेर पड़ा सोस ग्वीच रहा होती है। है। शायद मौकर उठा है. और भूग्व निवृत्तिके उपक्रम उसकी धारणा बदली--'अभी अशुभका बल क्षीण बगना चाह रहा है : बार-बार मुंह फाडकर अपनी भया- नही हुश्रा है। नकताको विकाम दे रहा है। गोल-गोल ऑम्बाको ग्बोलकर x इस तरहसे इधर-उधर देख रहा है जैसे मतलबकी चीज़ खोज निकालनी हो। चन्दनाके रूपने पहले तो भीलप्रभु श्रन्दर विकारकी अजगर रेंग रहा है। ज्वाला ही दहकाई ! किन्तु बादमे वह शान्त हो रहीं ' दी और चन्दना मूर्दित पड़ी है। सबब हुए, एक तो चन्दनाकी हट दृष्टिने उसे इरादा बदलने को विवश किया, दूपरे उसके बुढापेने उसे रोका और मम्मति दी--'अगर वह इस तरुणीको बेच डाले तो घरमे दही बिलोने देखा है । डोरीका एक मिरा अच्छी रकम हाथ लग सकनी है।-बूढ़ी, ममझदार-अक्स खींचते हैं, ना सरकी ढील पहुँचनी है। वह यह मोच की बात टालने लायक उभे हगिज़ नही जंची। और उसने मकना है कि मेरे माथ रियायन हुई, पर, चीज असल में यह ऐसा ही किया! अटवीमे वह उसे अपनी पढ़ी तक लाया नही है ! वह जबनक बन्धन मुक नहीं है, तब तक खतरेमे था। अब शहर ले चला। वाली नहीं है। उसका अपना कुछ नही। दूसरेके इशारेपर चन्दना मन ही मन खुश हो रही थी ! शायद मोचनी ही सो चलना है-वह खीचे, चाहं ढील दे! थी--'शहरम पहुँचकर, वह अपने घर तक जानेका प्रयग्न और इमीका नाम हम मुग्य और दुःख रखकर, हंसने यामानीमे कर सकेगी!' और रोने लगे तो शायद विवेककी गयमै बुद्धिमानी किन्तु देवकी आंख-मिचौनी अभी समाप्त कहां हुई थी? नहीं होगी। एक पैसे वालेने चन्द्रनाको खरीद लिया । भाशाम चन्दनाकीर प्रास्त्र म्बुनी तो ठीक ऐसी ही स्थिति अधिक धन भील-राजको प्राप्त हुआ। वणिकवर चन्दनाके उमे देखने को मिन्नी। पलक मारने उमने मोचा-'अब रूपपर अपनी पहली ही दृष्टिम मब-कुछ निछावर करनेकी निस्तार हो मकनाविधन की दृष्टि शायद टडी पर तैयार होगए थे! सौन्दर्य-मदिरा उन्हें चेतना-हीन कर चुकी थी! विडरूप मानव मुनि !! चन्दनाको वणिकपतिकी प्रांवों में स्पष्ट दीखा-उमका
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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