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________________ अनेकान्त [वर्ष ७ - प्रशस्त पुट लगी है, इसीसे वे स्व-पर-कल्याण में बहुत कुछ न्द्रिय सम्बाद ३ मनवत्तीसी ४ बाईस परीषहजय ५ सहायक जान पढ़ती हैं । कविका विशुद्ध हृदय विषय- वैराग्यपरचीसिका ६ स्वप्नवत्तीमी . सूवाबत्तीसी - और वासनाके जंजाबसे जगतके जीवोंका उद्धार करनेकी पवित्र परमात्मशतक प्रादि रचनाएँ बदी ही चित्ताकर्षक और भावनासे ओत-प्रोत है। और उनमेंकी अधिकांश कविताएँ शिक्षाप्रद जान पद्धती हैं। ये अपने विषयकी अनूटी रच. दूसरोंके उद्बोधन निमित्त लिखी गई है। नाएं हैं। कविवर भक्तिरपके भी रामक थे, इसीसे आपकी आपकी एकमात्र कृति ब्रह्मविलास है। यह भिन्न-भिन्न कितनी ही रचनाएं भक्तिरससे श्रोतप्रोत हैं । इस सग्रहम विषयोंपर लिखी गई ६७ कविताओं का एक सुन्दर संग्रह अापकी रचनाएं संवत् १७३१ से १७५५ सककी उपलब्ध है। इसमें कितनी ही रचनाएँ तो इतनी बड़ी हैं कि वे होती हैं। इसके बाद कितने समय तक श्राप और जीवित स्वयं एक एक स्वतन्त्र ग्रंथके रूपमें संकलित की जा सकती रहे हैं यह कुछ मालूम नहीं हो सका । अन्वेषण होनेपर हैं, और जो कितने ही ग्रंथ-भंडारों में स्वतन्त्र ग्रथके रूपमे संमव है आपके जीवन-सम्बन्धमें कुछ अधिक जानकारी उपलब्ध भी होती हैं । उक्त विलासकी ये कविताएँ प्राप्त हो सके। काव्य-कलाको दृष्टिसे परिपूर्ण हैं उनमें रीति, अलंकार, इस तरह भगवतीदास नामके चार विद्वानोंमेम दो अनुप्रास और यमा यथेप्त रूपमें विद्यमान हैं साथ ही, ऐसे हिन्दी कवि हैं जिनकी रचनाएँ उपलब्ध हैं और अन्तापिका, बहिर्लापिका और चित्रबद्ध काव्योंकी रचना जिनमेसे एक अग्रवाल जातिके और दूसरे प्रोसवाल जाति मी पाई जाती है। प्रस्तुत संग्रहमें यद्यपि सभी रचनाएँ के दिगम्बर जैन हैं । एकका अस्तित्वकाल विक्रमकी प्राय; अच्छी है; परन्तु उन सबमें १ चेतन कर्मचरित्र २ पंचे- १७ वी शताब्दी और दूसरेका १८ वीं शताब्दी है। __ ---- बन्दिनी --- [ भगवान महावीरके जीवन की एक झाँकी ] (लेखक-स्व० श्री भगवतस्वरूप जैन ) [ यह कहानी 'वारशासनाई' नामक विशेषाङ्कक लिये कुछ माम पूर्व प्राप्त हुई थी । खेद है कि लेखक महाराप प्रानी इस मुन्दर कृतिको अपने जीवन में प्रकाशित नहीं देख सके ! और ता. ४ दिमम्बरको अनेकान्त पाठको में भी मोह छोड़कर एकाएक स्वर्ग मिधार गये । अत: उनकी यह घरोहर उनके चिरपाटकोको समर्पित है। संपादक ] थी। उपवन महक रहा था । नर्गिक सौन्दर्य बिखर रहा चमना... था--हरी-हरी दुब रंग-विरगे विले-अधस्विले फूल । कोमलसी प्रतिमूर्ति, अनुपम सुन्दरी ! मुग्ध और किन्तु उधर, बेचारी चन्द नाका दुर्भाग्य झांक रहा था। समृद्धिके बीचमें विकसित होने वाला वह शरीर, जो दूसरे कोई नहीं जानता था, कि क्या होने जा रहा है, इन्हीं के भीतर प्रपन्नता, मुग्धना और अतृप्तता प्रविष्ट करनेमें मनोरंजनकी दो-चार घड़ियोंकि भीतर ? समर्थ। सखियो-पहेलियां, दाग्रियां सभी राजकुमारीका पदा. राजकुमारी खिले हुए नए फूलोंमे मन बहला रही नुसरण कर रही थी। सब प्रमोदमन !
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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