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________________ ५० अनेकान्त [वर्ष ७ - पंक्तियां और प्रत्येक पंक्तिम ५२ अक्षर हैं । साग ग्रंथ लिनीविकामनैकदिनर्माणः भट्टारकश्रीदेवनदेवा पाँच मगों में विभक्त है। प्रत्येक मर्गके अन्तमे यह तत्प? कविविद्याप्रधानभट्टारकश्रीविमलमेनदेवाः पुष्पिका है तत्पट्टे भट्टारकर्ष'गुणकी निदेवाः तत्पट्टे भट्टारकश्री"इति श्री श्रतपंचमी-फलानुस्मृते भविष्यदत्त यशःकीर्निदेवाः तत्पट्टे 1 दयादि(द्रि) चूडामणिचरित पं० पद्मसुन्दर विचित माधुनावात्मज साधु भट्टारकश्रीमलयकीनिदेवाः तत्पटे वादीभकुंभस्थलश्रीगयमल्ल मभभ्यचिते भविष्यसंगभो नाम ... .. विदारणैककेसरि भव्याम्बुज विकामनकमार्तण्टः दुर्गम द्वितीय परिच्छेदके अन्तम और चतुर्थ परिच्छेद पंचमहाव्रतधारणकप्रचण्डः चारुनारित्रोद्वहनधगधीरः के अन्तमं नीचे लिखे दो पद्य हैं निर्जितैकवीरः भट्टारकश्रीगुणभद्रसूग्देिवाः नत्पट्टे श्रीजिनशामनर्यः श्रावकवयः कतामपरिचर्यः । भट्टारकश्रीभानुको तिदेवाः नत्मिप्यमंडलाचार्यश्रीकुमारश्रीरायमल्लनामा जोगाद्धार्मिकशिगेरत्नम ॥ सेनिदेवा तदाम्नाये अग्रोतकान्वये गोडलगोत्रे सुदेमजिनेन्द्रपूजाचरणे पुरन्दरः सदा सदाचार्गवचारसुंदरः। परदेशविष्यातामनु चौधरी छाजू तयो पुत्र मेरुवन विशुद्धमद्धर्म विधा(धो)धुरधरःमरायमल्लो जयतात्मुबंधुः। पंच । प्रथमपुत्र अनेकदानदाइकु चौधरी ही(?), दुतियं ' पुत्र चौधरी बूढणु २, त्रितियु पुत्र चौधरी नग्पालु ३, पंचम परिच्छेदकी समाप्ति के पहले नीचे लिख चौधरी भोगा ४, चौधरी नरसिंघ भायां दो पद्य हैं सीलतायतरंगिणी माध्वी मदनाही, तयोः पुत्रत्रयं, आन्दन्दोदयपर्वतकतरणगनन्न मेरोगेंगे: प्रथमपुत्रु चौधरी नानृ भार्या माध्वी प्रोढरही नयो। शिष्यः पंडितमालिमंडनमणिः श्रीपद्ममेकः। पुत्र द्वी, प्रथमपुत्रु चौधरी ( दुतियपुत्र) अनेकदाननच्छिायोत्तनपद्मसुन्दरविः काव्यविभिधं दाइकु चौधरी गगमनु नस्य भार्या मावी हो । प्रथम चके धार्मिकरायमल्लभविकम्याभ्यर्थनामंकनः ॥२५ भार्या माध्वी उधाही दुतिय भार्या माध्वी मीनाही, अन्दे बिक्रमराज्यतो मनु-रस-श्वनांशुमंख्यकता तयो पुत्रत्रयं प्रथमपुत्रनिरंजीव अमीचंदु, तम्य भार्या नन्दे कार्तिक शुक्मलोम्यमहिनो घरपंचमीवामरे । माध्वी जेठमलही, चौधरीगयमल्ल दुनियपुत्रु चिरजीवी मक्तियक्तिभविष्यदनचरित काव्यं सुबन्ध मनां उमीघ, त्रितियपुत्र चिरजी-(इसके आग का पत्र श्रत्यर्थ किल गयमल्लविक्म्याभ्यर्थनाशनः ।।६ नही है)। पंचमपरिच्छेद के बाद माह रागमालका नीचे बनीभवनके गंजप्टरम और ग्रन्थक उपर लिया आशीर्वाद देकर फिर लिपिक.मी प्रशनि दी इम ग्रन्यका नाम 'कथाकोश' और ग्रन्थव नावा नाम गई है 'पद्मनन्दिमूरि' लिग्या हुआ है ! ग्रन्थका नम्बर अग्रोनवंश गगनाग मनमप्तिः मन्मानिर्वपग्णवृत्तनपानुरक्तः । द्वितीय ग्रन्थ गयमल्लाभ्युदय खंभानकी श्री आप्रोक्तयुक्तपरमागमभाविनात्मा कल्यागाचंद्रकी लायब्रेगमे है जिम्की नांध प्रो. नान्यात्मजो जगान नन्दतुगयमहः।। गीटर पिटसनने 'जनल आफ दि बाम्बेत्रांच रायल आशीर्वादः ।५ । हान भी भविष्यदनचरिनं एशियाटिक मोमाइटी' के (पाटा नम्बर सन १८५७) श्रतपंचमीगर्मिन ममाप्त। . म ली है। मंवत १६५ वर्प मागुणमुदि मममी बुधवामा उक्त प्रति १०५ पत्रोंकी है और सम्पूर्ण है। अकाग्गज्ये प्रवनमाने अंगाष्ठमधे माथुगन्वये ग्रन्थम चौबीम तीर्थकरोका चरित्र है। ग्रन्थका पुष्करगणे उभयभापानवारण तपोनिधिः भट्टारक श्री- प्रारम्भिक अंश और अन्त्य प्रशस्ति आगे दी उद्धरमदेवाः तत्व मट्टानजलममुद्रविवेका लाम- जाती है । अन्त्य प्रशस्ति । भविष्यदत्तचरितकी
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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