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________________ yE अनेकान्त [वर्ष ७ पधानता-रहित ग्रंथोममें एक ग्रंथ है और इस लिये उस ऐसा कोई नियम भी नहीं है जिससे एक ग्रंथकार अपने की यह तर्क-हीनता सन्देहका कोई कारण नहीं हो सकती। संपूर्ण ग्रंथोम एक ही पद्धतिको जारी रखने के लिये बाध्य *ऐसा नही कि रत्नकरण्डमे तर्कस बिल्कुल काम हीमालया हो सके। नानाविषयोंक ग्रन्थ नाना प्रकारके शिष्योंकी लपव करके लिखे जाते हैं और उनमे विषय तथा शिष्यचिकी गया है। जरूरत होने पर उसका अच्छा स्पष्टीकरण किया विमित्र विभिन्नसाके कारण लेखन पद्धति में भी अक्सर विभिनता जायमा। यहाँ सुचनारूपम ऐसे कुछ पद्याक, नम्वरोको हुमा करता ह। (१५० की संख्यानुसार) नीट किया जाना है, जिनमे तर्कस ऐसी हालतम प्रेमीजीने रत्नकरण्ड-श्रावकाचारके कर्तृत्व कुछ काम लिया गया है अथवा जो तर्कष्टि का लक्ष्यमे विषयपर जो अ.शंका की है उसमें कुछ भी सार मालूम रख कर लिखे गये हैं:-५,८,६, २१, २६, २७, २९., नही होता। प्राशा है इस लेख परमे प्रेमीजी अपनी शका ३०, ३१, ३२, ३३, ७, ४८,५३, ५, ६७, ७०.७१, का यथोचित समाधान करने में समर्थ हो सकेंगे। ८२, ८४, ८५.८६,६५, १०२, १२३ । वीरभवामन्दिर, सरसावा, ना. २७-१२-१६४४ शो क संवेदना श्री भगवत्स्वरूप-वियोग! चौधरी जग्गीमल-वियोग! यह मानमरके बड़ा ही दुःख तथा अफमाम हुश्रा बहला जैनममा लब्धप्रनिष्ठ श्रीमान चौधरी लाला कि अनेकान्तके प्रसिद्ध कविता तथा कहानी लेखक श्री जग्गामलजी जैनका ता. २६ अक्तूबरको ८० वर्षकी अवस्था भगवस्वरूपजी प्रान इस सम्माम्मे नही -ता. ४ दिस. में मात्र तीन दिनकी बीमारी में स्वर्गवास हो गया। आपके म्बरको मोमवार के दिन प्रान्तोंकी बीमारीके कारण उनका इस निधनमे स्थानीय जैन समाजकी ही नहीं, किन्नु भारत स्वर्गवास होगया है, और इस तरह व समाज तथा अने- के सारे जैन ममानकी एक बड़ी भारी क्षति हुई ।प्राप जान्नके पाठकों सदाके लिये बिड गये हैं । आप एक स्थानीय और बाइरके धार्मिक कामोमेसदा अग्रसर रहते थे। परछे उदीयमान कवि तथा साहित्यमेवी थे, आपकी शक्तिया बद्धो, युवकों या संस्थानों का वेहलीमे ऐसा कोई जस्सा नहीं दिन पर दिन विकसित हो रही थी और समाजको श्राप जिसमे आपकी मौजूदगी न रहती हो। समाज और धर्मकी बड़ी बड़ी प्राशाग थी । आप भनेकान्तसे बड़ा प्रेम रखने मेवाके लिये श्राप सदैव तत्पर रहते थे । आप वीरसेवा और उसे अपनी अछी अच्छी रचनाएँ भेजा करते थ। मन्दिरक बडे हितैषी थे और उसके कार्योम नथा विद्वानों यापक इस वियोगमे अनेकान्त परिवारके चित्तको बडा धका के साथ पूरीमहानुभूति रखते थे। आपके अधीनस्थ पंचाईचा। हम पद्गत प्रारमाके लिये परलोकमे सुम्पशांति यती जैनमन्दिरका शामा भगडार वीरसेवामन्दिरक विद्वानो की हार्दिक भावना करते हुए कुटुम्बी जनाके इस प्रसता के लिये बराबर खुला रहता था । वीरसेवामन्दिर परिवार द खमे समवेदना प्रकट करते हैं। आपके इस वियोगमे अत्यन्त दुखी है और उनके लिये शान्तिको कामना करता हुमा कुटुम्बी जनांके प्रति हार्दिक -मम्पादक मवेदना प्रकट करता है। -सम्पादक
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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