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________________ किरण ५-६] स्वामी समन्तभद्र धर्मशामी, ताकिक और योगी तीनो थे __ मेरे उक्त फुटनोटको लक्ष्य में रखते हुप प्रेमीजी अपने दिये हुए हैंलेख में लिखते है-'यदि यह कल्पना की जाय कि पहले नमः ममन्तभद्राय महतं कविवेधस । मोकने बाद ही तीसरा श्लोक होगा, बीनका श्लोक गलतीसे यढची व गतेन निर्मिना: कुमताद्रथः ।।४३।। तीसरंकी जगह छप गया होगा-अयपि इसके लिये हस्त करीनागमकानांप वादीनां वाग्मिनामपि । लिखित प्रतियोंका कोई प्रमाण अभी तक उपलब्ध नही यशः मामन्तभद्रीयं मूनि चूड़ामणीयते ।।४४॥ हुआ, तो भी, दोनों को एक साथ रखनेपर भी, स्वामी और योगीन्द्रको एक नहीं किया जा सकता और न उनका -आदिपुगगग, प्रथम पर्व पम्बन्ध ही ठीक बैठना है।" परन्तु सम्बन्ध क्यों कर ठीक यहाँपर यह बात भी नोट कर लनेकी है कि भगवजिन. नहीं बैठना और स्वामी तथा योगीन्द्रको एक कैमे नही मेनने, 'प्रवादिकरियूथानां' इस पचपे पूर्वाचार्योंकी स्तुनि किया जा सकता ? इसका कोई स्पष्टीकरमा पापने नही का प्रारम्भ करते हुए. ममतन्द्र और अपने गुरु धीरपेनके किया। मात्र मह कह देनेमे काम नहीं चल सकना कि लियं तादादो पद्यामे स्तुनि की है, शेषमे किमी मी "तीनोंमे एक एक आचार्यकी स्वतंत्र प्रशस्ति है" । क्योंकि प्राचार्य की स्तुनिके लिये एक से अधिक पधका प्रयोग नहीं यह बात तो अभी विवादापन ही है कि तीनों एक एक किया है। और इस लिये यह स्नानकर्ताको दरछा और मचिप्राचार्यकी प्रशस्ति है या दोकी अथवा तीनकी। वादिरात पर निर्भर है कि वह मबकी एक एक पथ स्तुति करताहुमा मरिने तो कही यह लिखा नही कि हमने १५ भोकाम भी किसीवानी या तीन पयोम भीस्तुति कर सकता है--उप पूर्ववती १५ ही प्राचार्योका या कवियाका स्मरण किया है" कोमा कग्नम बाधाकी कोई बाम नहीं है। और इस लिये और न परे ही किसी पाचायने मी कोई सूचना की है। प्रेमीजीका अपन उमनपर यह नतीजा निकालना कि इम मिवाय समन्तभद्रके माथ 'देव' उपपर भी तुवा नब उन दो लीकाम एक ही समन्तभद्रकी स्तुति की या पाया जाता है, जिसका एक उदाहरण देवागमकी होगी, यह नहीं हो सकता" कुछ भी युक्ति-संगन सनन्दि वृत्तिके अन्त्यमंगलका निम्न पद्य है-- मालन नही होता। समन्तभद्रदेवाय परमाथावकाल्पने। हा. एक बात जेवक अन्तम प्रेमीजीने और भी कही ममन्तभद्रदेवाय नमोऽस्तु परमात्मने ॥ १॥ । मभव है वही उनका अन्तिम तर्क और उनकी और इम लिये उक्त मध्यवर्ती श्लोकम पाए हप ' आमकाका मूलाधार हो, वह बात हम प्रकार हैपद वाग्य समन्तभद्र भी हो सकते हैं, जैसा कि "देवागमादिकं कत्ती और नकरणक कर्मा अपनी मल्लिखित फुटनोटमे कहा गया है, उसमें कोई बाधा रचनाशैली और विषयको टिम भी एक नहीं मालूम होने। नहीं पानी। एकता महान तार्किक हैं और दूसरे धर्मशास्त्री। जिनमेन इसी तरह यह कह देनेसे भी काम नहीं चलता कि धाति प्राचीन ग्राचार्याने उन्हें वादी, वाग्मी और तार्किकके 'तीनो श्लोक मजग अलग अपने आपमे परिपूर्ण हैं, वे क रूपमे ही उल्लेखित किया है, धर्मशाम्रीक रूपमें नही। एक दुसरेकी अपेक्षा नहीं रखने।' यो कि अपने आपमे योगह जैमा विशेषण तो उन्हें कही मीनई दिया गया।' परिपूर्ण होते और एक दूसरेकी अपेक्षा न रम्बने हुए भी इससे मालूम होता है कि प्रेमीजी नामी ममन्तम क्या ऐसे एकमे अधिक श्लोकोंके द्वारा किमीकी स्तुति नहीं को ताकिक तो मानने है, परन्नु 'धर्मशाम्री' और 'योगी' की जा सकती ? जरूर की जा सकती है। और हमका एक माननेमे सन्दिग्ध है. और अपने इस मन्दहके कारण सुन्दर उदाहरण भगवजिनसेन-द्वारा समन्तभद्रकी ही म्वामीजीके द्वारा किसी धर्मशाप्रकारचा जाना तथा पाचस्तुनिके निम्न दो श्लोक हैं, जो अलग अलग अपने परि- नाथ-चरितके उम नीम श्लोक में योगीन्द्र' पदके द्वाग पूर्ण हैं, एक दूसरे की अपेक्षा नही रखने और एक माय भी स्वामीजीका उल्लेख किया जाना उन्हें कुछ संगत मालुम
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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