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________________ किरण १-२ ] सन्देश-दात्री रहा हो। कहाँसेमीवा, कुन्नल ? कुन्तल - श्राज कैलाश बनमे वीर शासन- जयन्ती मनाई कुन्तल - अरे श्राप नहीं जानते । आज श्रावण कृष्ण प्रतिपदा है न, श्राज कि दिन तो जैनधर्मक चौवीसवं नीर्थकर श्रीमहावीर स्वामीने संमार के सब प्राणियोको सुखी बनाने के लिये अहिसा धर्मका उपदेश दिया था । महामेन - श्रभी जो सुन्दर गीत तुम गार ही थी क्या यह उन्हीका उपदेश है ? कुन्तल -- जी हाँ । महासेन -- परन्तु श्राचार्यश्री तो जारही है, वही सुना था । महामेन - वीर शासन - जयन्ती ! वीर शासन -जयन्नी किसे महासेन परन्तु श्राचार्यश्रीने बतलाया था कि यज्ञमे कहत हैं ? जला हुआ जीव मीधा स्वर्ग जाता है--उमे कष्ट कैसा ? इस प्रकार हमारे द्वारा उसे भी मुक्ति मिल जाती है। कुन्तल -- हुइ ! बरबस बिचारेर मुक्ति लाद दी । यदि ऐसा ही है तो सबसे पहले अपनी ही आहुति देना चाहिये। देर होने सम्भव है अकाल मृत्यु के कारण ऐसा श्रवभर न मिल सके ! महासेन - कुन्तल ! तुम ठीक कहती हो । मेरी भूल थी, मैं धकार था। अब मैं अपनी भूल समझ रहा हूँ । केशव ! श्राश्रो, चलें, हम भी धीरशामन - जयन्तीम साम्मलित होकर उनका सुन्दर उपदेश सुने | धनंजय - - महाराज ' अश्वपालकोको क्या श्राज्ञा दी जाय ! महासेन - अब महायज्ञ नहीं होगा, वे जायें । धनजयार महासेन कहते थे कि महावीर - स्वामी ने भी मोहका त्याग करनेमे ही मुक्ति मानी है और मोहका त्याग दी तो हम महायज्ञ द्वारा भी करते हैं। कुन्तल - श्राप जिसे मोहका त्याग कहते हैं, वह तो झूठे स्वार्थकी साधना है | जब हम दुख और कष्टसे डरते हैं तो हमे कौनमा अधिकार है कि हम दूसरोंको दुख दं | भगवान महावीर ने कहा था कात्मकता के यज्ञमें अपने राग-द्वेष भावोंकी और अपने झूठे स्वार्थी आहुति देन मैं सोचता हूँ, अगर जीवनमेंले पर्व या उत्सव अलग कर दिये जॉय, तो जीवनको क्या कोई हानि हो जायगी ? इस प्रश्न के उत्तरसे हम निश्चित रूपसे पर्वोंकी आवश्यकता या अनावश्यकताका अनुमान लगा सकेंगे । १५ चाहिये वही सच्चा मोदका त्याग है, पर आपने अपने झूठे स्वार्थके यशमं बेचमाणियां की श्राहात दे डाली! यह अर्थ का अनर्थ नही तो क्या है ? जैनसंस्कृतिके प्राण- जैनपर्व ( लेखक - पं० बलभद्र जैन ) एक बार पंडित जवाहरलाल नेहरूपे किसी व्यक्तिने कांग्रेसके उत्सवों, समारोहों और आयोजनोंके सम्बन्धमें पूछा कि इनमें देशके समय, धन और शक्तिका व्यर्थ ही और और कुछ नहीं, धनंजय जाश्री— कुन्तल श्राश्र ! हम सब सन्देश गान करते हुए चले। [ सबका वीर मदेश की पुनरावृति करते हुए प्रस्थान ] अपव्यय होता है तो इन सबमे क्या लाभ है या इनका देशके लिये क्या उपयोग है? पंडितजीने इसका उत्तर देते हुए कहा -- कॉंग्रेस के उत्सव और समारोह देश को कांग्रेस का सन्देश सुनाते हैं, वे देश को स्वतन्त्रताकी भावनाके रूपमे नवजीवन और स्फूर्ति प्रदान करते हैं, और उस भावनाका सार्वजनिक और सामूहिक प्रचार करते हैं। देशको ऐसे कुछ इने गिने ही उसकी आवश्यकता नहीं है, बल्कि गुलामी से यदि हमें मुक्त होन
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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