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________________ ७० अनेकान्त वर्ष ६ नहीं है कि उस समय सभी एकमतके थे, उस समय भी अङ्ग देवा अस्य विसर्जने नाथ, अनेक सम्प्रदाय थे, अनेक विद्वान् जगतको उत्पन्न हुश्रा को वेद यन प्रा बभूव ।। मानते थे। उन माननेवालों वैदिक मुनियोंने अनेक ऐसे ऋ. मं...सू. १२६६ प्रश्न किये हैं जिनका उत्तर आज तक भी जगत-रचना यह सब पमारा कहांमे आया इपका कथन विश्वास वादियों नहीं बन पड़ा है। वेद कहता है--श्रय सृष्टिकी पूर्वक कौन कर सकता है?' वे देव भी बादमें बने होंगे उत्पत्ति माननेवालो ! पार यह बताओ कि पृथ्वी, चांद, जिनकी तुम साक्षी देना चाहते हो। वेद भागे कहता है कि सूरज तथा असंख्य तारागणों पे पहले किपको उत्पन इयं विसृष्टिर्यत अबभूव यदि वा दधे यदि बा न । किया गया। क्योंकि यह सम्पूर्ण चीजें एक दूसरेके पाश्रय यो अस्याध्यक्ष परमे व्योमन मोअंग वेद यदि वान वेद।। से ठहर रही हैं। यदि इनमें एक भी न हो तो यह साग मन्त्र ७ जगत गिर कर चकनाचूर हो जायेगा। अब यदि आप कहें यदि यह कहो कि सर्वज्ञ श्रादि गुण युक्त हिरण्यगर्भ कि पृथ्वी पहले बनी तो वह किसके श्राश्रयपर स्थित की प्रजापति इसकी रचनाके विषयमें जानते हैं। यह कहना भी गई, यदि कहो कि वह अपने ही प्राधारपर स्थित थी ग़लत है क्योंकि (सो न वेद) वह भी नहीं जानता, जब यह तो पारमाश्रय दोष पाता है। और अन्य सूर्य आदि उस जगत नित्य अजर अमर है इसकी बनावटको यह कैसे जान समय थे ही नहीं जिनके श्राकर्षणसे यह ठहर सकती-- सकता है। अथर्ववेदमे तो स्पष्ट शब्दोंमें घोषणा की गई है कतरा पूर्वा कतरा पराय: कथाजातो कवयो को न विजानामि यतग परस्तात ।। कां. १०-७-४३ विवेद ॥ ऋ. मं. सू० १८५११ हिरण्यगर्भ प्रजापति कहता है कि मैं नहीं जानता कि इसीके माथ वेद एक महत्वपूर्ण प्रश्न और भी करता कौन प्रथम उत्पन्न हुआ । अतः यह कहना कि सर्वज्ञादि है वह है-क्यों, और कैसे, अर्थात् वेद कहता है कि यदि जानते हैं यह भी मिथ्या कल्पनामात्र है। आप इसका उत्तर नहीं दे सकते कि पहले कौन सी चीज पूर्वमीमांसा और जगत बनी है तो यही बतादो कि यह जगन क्यों बना है ! वैदिकदर्शनमें पूर्वमीमांपाका बहुत ऊँचा स्थान है। (कथाजात:) और कैसे बना है एवं कौनसा वह विद्वान है इसी दर्शनके सुप्रसिद्ध प्राचार्य कुमारित्जभट्टने श्लोकवार्तिक जिसने इसको बनते देखा है, अथवा किसी अन्य प्रमाणसे मे उपरोक्त वैदिक प्रश्नों को दोहराया है । आप लिखने हैं जाना है। तथा च वेद यह भी प्रश्न करता है कि यही ज्ञाता च कस्तदा तस्य यो जनान बोधयिष्यति । बतादो कि अमुक व्यक्ति ने इस संमारको बनते हुए देखा है उपलब्धेविना चैतत् कथमध्यवसीयताम् । जिमसे जनताको कुछ तो सन्तोष हो सके-- श्लो० वा० ५१४६ को ददर्श प्रथमं जायमानम || ऋ० १११६४४ प्रजापतिने जब सृष्टि रची उस सयय उसके देखने यदि आप यह कहें कि क्या हुआ यदि हम इपको बाला कौन था जिसने सृष्टि बननेकी सूचना जनताको दी। नहीं जानते हमारे पूर्वज अथवा देवता आदि तो जानते क्योंकि विना सालाकारके उसका निश्चय कैसे होसकता है? होंगे। इसका उसर वेद स्वयं स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य प्रवृत्ति कथमाद्या च जगतः संप्रतीयते । शब्दों द्वारा देता है कि न तो आज तक किसीने इसको शरीरादेविना चास्य कथमिच्छापि सजने ॥४७॥ बनते देखा है और न किसी विद्वान् ने इसका समर्थन किया शरीरायथ तस्य स्यात्तस्योत्पत्ति वै तत्कृता। है कि यह जगत बना है। जिन देवोंका पाप जिक्र करते हैं तद्वदन्यप्रसङ्गोऽपि नित्यं यदि तदिष्यते ।।४।। वे भी भापके सिद्धान्तानुसार पृथ्वी भादिके पश्चात् ही पृथिव्यादावनुतान्ने किम्मयं तत्पुनर्भवेत् । उत्पन्न हुए होंगे। फिर उन्होंने जगतको बनते हुए कैसे प्राणिनां प्राय दुःखांश्चसिसृक्षास्य न युज्यते ॥४६॥ देख लिया? सावनं चास्य धर्मादितदा किंचन विद्यते । कोश्रद्धावेदकहह प्रबोचत, कुतःआजाताकुत इयं विसृष्टिः नच निस्साधनः कर्ता कश्चित्सृजति किंचन ॥५०॥
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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