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________________ पत्रकारके कर्तव्यकी अवहेलना [सम्पादकीय ] 'प्रो. हीरालालजीके प्रति अन्याय' नामका एक लेख अधिकार था? अस्तु । पं. नाथूरामजी प्रेमीने जैनमित्रके गत 10 मईके अंक ता. २२ जूनके पत्रद्वारा मैंने सम्पादकजीको कुछ नं. २७ में प्रकाशित कराया था, जिसके अन्तमें उन्होंने गलतियों की सूचना देते हुए उनका संशोधन प्रकट करने यह भी लिखा था कि पो.हीरालालजी के एक नोटको, जिममें और छूटे हुए पैरेग्राफको छापनेका अनुरोध किया था; 'संयत' शब्दके शामिल करने की चर्चापर प्रकाश डालने परन्तु उस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया-8स वक्तसे ओर अग्नी मफाई देने की बात थो, किसी भी जैनपत्रने जैनमित्रके तीन अंक निकल चुके हैं, उनमें संशोधन प्रकट नहीं छापा और ऐमा लिखकर जैनपत्रकारों को अपने कर्तव्य- नहीं हुा-और न पत्रका कोई उत्तर ही दिया गया है। पाजनमें लापर्वाह बतलाते हुए यह चेतावनी भी की थी ऐसा भी नहीं कि पत्र पहुँचा न हो क्योंकि उस पत्रके कि 'इस लापर्वाहीका परिणाम क्या हो सकता है। इसे साथ जो 'अनेकान्त' के प्रकाशनमें विलम्ब-विषयक समाचार पाठक सोचे। भेजा गया था वह अगले हो अंकमें कुछ तोड-मरोड कर इपी लेखको लेकर मैंने 'प्रो. हीरालालजीकी नीयत तथा विलम्बका कारण न प्रकट करते हुए छाप दिया गया पर आक्रमण' नामका एक लेख १५ मई को लिखा था और है। अत: आज मजबूर हो कर उस पैरेग्राफको नीचे प्रकट उस जैनमित्रमें छपनेको भेजते हुए उस परमविकजरूपये किया जाता है:.छाम्ने की सूचना भी करती थी। मेरा यह लेख ३१ मई के "लेखके अन्त में प्रेमीजीने एक बात और भी कही। जैन मिन अंक ३० में छपा जरू। परन्तु उसे अविकल- और वह यह कि 'संयन' शब्दके सामिल करनेकी चर्चापर रूपसे नहीं छापा गया। उसमें साधारण अशुद्धियों के अलावा प्रकाश डालने और अपनी मफाई देनेके लिये प्रो० साहबने कितनो ही अशुद्धियां ऐसी भी पाई जाती हैं जो अर्थभेदको एक नोट कुछ समय पहजे जैनपत्रों में प्रकाशित करनेके लिये लिये हुए हैं तथा साहित्यिक गिरावटको सूचित करती हैं- भेजा था परन्तु अभी भी उन्हीं मालूम हुआ कि उसे जैसे कि 'प्रवृत्त हो' की जगह 'प्रवृत्त हैं.' 'जिज्ञासु प्रकृतिके' किमीने भी छापनेकी कृपा नहीं की।" अच्छा होता यदि की जगह 'जिज्ञासु प्रवृत्तके' 'जिम' की जगह 'जियस', प्रेमीनी यहाँपर उन पत्रों का नाम भी दे देते, जिससे किसी 'चिडाने के स्थानपर 'चिल्लाने', 'शीघ्र तथा स्थायी' के ने भी' शब्दों द्वारा सभी पत्रोंको लौंछित होने का अवसर स्थान पर 'शीघ्रतया स्थायी' और 'अलग रखना चाहिये न मिलता। जहाँ तक मुझे मालूम है 'अनेकान्त' आफिस के स्थानपर मजग रहना चाहिये गलत छपा है- इतना में प्रो. साहबका ऐसा कोई नोट प्रकाशनार्थ नहीं पाया। ही नहीं बल्कि लेखका अन्तिम पैरेग्राफ बिल्कुल ही अाता तो वह जरूर छाप दिया जाता। अस्तु, प्रेमीजीने निकाल दिया गया है और उसके द्वारा लेखको बँडूरा बना ऐसे पत्रकारों को अपने कर्तव्यका पालन करने में लापरवाह' कर उपका वजन हो कम नहीं कर दिया बचेक अपने माथ बतलाया है और उप लापरवाहीका परिणाम क्या हो 'अनेकान्त' की भी उम दोषका दोषी बना रहने दिया है सकता है उसकी और संकेत किया है. जो बहुत कुछ ठीक जिप पर प्रेमीज ने आक्षेप किया था और जिपसे 'अनेकान्त' जान पड़ता है। प्रो. साहबके विषयमें लोग गुमराह रहें का उक्क पैरेग्राफ द्वारा संरक्षण किया गया था। मालूम नहीं और उनकी सफाईसे भी अवगत न हो सकें, इस उद्देश्यको सहयोगी 'जैनमित्र' को जब मेरा लेख अविकलरूपये लेकर जिन्होंने वह नोट नहीं छापा है उन्होंने अवश्य ही बापना इष्ट नहीं था तो उसे क्यों छाग गया ? छापनेके पत्रकारले कर्तव्यकी अवहेलना की है।" मोहको संवरण करके उसे वापिस क्यों नहीं कर दिया लेखक इस पैरेग्राफको न छापनेके लिये बज़ाहिर गया? काट-छांटकर छापनेका उसे ऐसी स्थिति में क्या (प्रकटतया) कोई माकूल वजह नजर नहीं पाती, फिर भी
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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