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________________ किरण :-१०] मोक्ष तथा मोक्षमार्ग मिलता है: जायगा । अाएव प्रत्येक प्राणीका कर्तव्य होता है कि प्राप्त दसणमूनो धम्मो उवइट्ट जिण वरेहिं मिस्साणं ।। हप साधनोंसे लाभ ले और सम्यग्दृष्टी बनें। बिना सम्बतं सोऊण सकरणे देसणहीणो ण वंदिव्यो। दर्शन प्राप्त किये हम सुखी नहीं बन सकते हैं। यस समिट मोच पिके विषय में और जिस सम्यग्दर्शनकी उत्पत्ति के साथ ही पूज्य. सम्यग्दर्शनका स्थान स्वामी समन्तभद्राचार्य जीके शब्दोंमें पादके वचनोंमें :'कर्णधार' रूप ही होता है। भागे चल करके भी प्राचार्य "तदैव तस्य मत्यज्ञानश्रुताज्ञाननिवृत्तिपूर्वकं मतिज्ञानं श्रीसमन्तभद्रस्वामीनीने सम्यग्दर्शनकी प्रधानताके विषय तज्ञानं चाविर्भवति । घनपटविगमे सवितः मे विस्खा है कि: प्रतापप्रकाशाभिव्यक्तिवत् ।" विद्यावृत्तस्यसंभूतिस्थितिबृद्धिफलोदयाः । उसे उसी समयमत्तिज्ञान, श्रुतज्ञानकी प्राप्ति उमी न मन्त्यमति सम्यक्त्वे वीजाभावे तगेरिव ॥ प्रकार हो जाती है । जिस प्रकार कि मेघपटलके दूर होते ही प्राशय यह है कि इयलिंगी मुनिराजके भावलिंगी सूर्यका प्रताप और प्रकाश एक साथ व्यक्त हो जाता है। मुनिराजके सदश चारित्र होने पर भी तथा अंग और और जिम सम्यक्ज्ञानके पश्चात ही यथा समय सम्यकपूर्वरूप शास्त्रज्ञानक हो जाने पर भी भेदविज्ञान (सम्यग्द- चारित्र उत्पन्न होता है। र्शन) के प्रभाव में वह ज्ञान और चारित्र कोई काम नहीं प्राप्म वशुद्धिका होना चारित्र कहलाता है यह प्रात्महैं। जब कि यह नियम है कि - विशुद्धि क्रम क्रमसे होती है । गृहस्थाश्रममें तो सीमित सम्यग्दर्शनकी उत्पत्तिके साथ २ ही जो कुछ भी आत्म-विशुद्धि होसकती है। अर्थान् पंचमगुणस्थानवी देशयरिकचित् ज्ञान होता है वही सम्यग्ज्ञान कहलाता है। तथा चारित्र जन्य आत्मविशुद्धि ही गृहस्थाश्रममें हो सकती है। सम्यग्दर्शन-ज्ञानका सद्भाववाला चारित्र ही सम्यक परिपूर्ण प्रात्म विशुद्धिके लिये मुनिवत धारण करना भावश्यक है.--- बिना मुनिपद धारण किये परिपूर्ण प्रारमचारित्र नाम पाता है। अतएवसम्यग्दर्शनकी प्रधानता स्वयं विशुद्धि हो ही नहीं सकती है, क्योंकि प्रारमविशुद्धि में बाधक सिद्ध है। परिग्रहादिकका प्रभाव मुनिपदमें ही हो सकता है। उस उपरोक्त विषयके लिये निम्न लिखित वाक्यसे भी साधु अवस्थामें प्रत्याख्यानचतुष्कादिक कर्मप्रकृरियोंके महत्ता मिलती है। क्षयोपशमके वलपर गुणस्थानवृद्धिके साथ २ ही मारम"दंमणभटाभट्रा दंसणभट्रस्स पत्थि णिवाणं" विशति ली जाती विशद्धि होती जाती है। आगे मोक्षप्राप्तिका नियामक द्वार है अर्थात् - जो सम्यग्दर्शनसे भ्रष्ट हैं उनका निर्वाण पकश्रेणीको प्राप्त कर कर्मप्रकृतियोंका क्षय करता हुमा नहीं होता है । इस लिये हमें मम्यग्दर्शनकी प्रारमविशद्धि करता जाता है और यथाख्यात चरित्रकी प्राप्तिके लिये सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिये, प्राप्ति होनेपर ६३ प्रकृतियोंके चय होते ही तेरहवें. यद्यपि सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिक लिये करणलब्धिका होना गुणस्थानमें पहुँच कर जीवन्मुक्त परमात्मा हो जाता है। इस नियामक है । तथापि जो व्यक्ति सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति के लिये महंत अवस्थामें वह संसारके प्राणियोंको कल्याणका तत्वचिंतवन, स्वपरके विषयमें परामर्श, देवशास्त्रगुरुको मार्ग बताता है। पश्चात् यथासमय योगनिरोध पूर्वक बाकी श्रद्धा, एवं प्रारमस्वरूपके चितवनादिकमें अपने परिणामो की सम्पूर्ण ७२ और १३ कर्म प्रकृतियोंका सय हो जानेपर को लगावेगा. उसके नियमसे सम्यग्दर्शनकी बाधक कर्म- मामाकी जो अवस्था होती है वही सिद्ध अवस्था कहलाती प्रकृतियों का उपशम, क्षय, क्षयोपशम होकर उपशमसम्यग्द- है। और उसी अवस्थाको मोक्ष कहते हैं । एवं सम्यग्दर्शन, शन. सायोपशमसम्यग्दर्शन या क्षायिकसम्यग्दर्शन हो सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्रकी एकता ही मोक्षमार्ग।
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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