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________________ १४४ भनेकान्त [वर्ष ७ - तवं अस्सि च णं अढ णो पयाते तव्वं भवतिअसुयाणं तस्वोंको ग्रहण करनेके लिए तैयार रहो (३) पाप कमौके धम्माणं सम्म सुण णाते अब्भुढे तध्वं भवति १ परित्यागके लिए तैयार रहो (४) पूर्व संचित कर्मोको तपके सुताणं धम्माणं ओगिराहयाते अवधारणयाते द्वारा नष्ट करने के लिए तैयार रहो (५) जो दीन हों श्रनाथ अब्भु? तव्वं भवति २ पावाणं कस्मारणं संजमेण य हो जिनका कोई नही हो उनको हर तरहसे सहायता देनेके करणताते अब्भुट्टे यव्वं भवति ३ पोराणाणं कम्मारणं लिए तैयार रहो (६) धर्मके जिज्ञासुओंको यथोचित श्राचार तवस्त विगि चणताते विसोहणताते अब्भुट्ठयवं विचारकी शिक्षा देनेके लिए तैयार रहो (७) रोगियोंकी भवइ ४ असंगिहीतपरितणस संगिएहणताते प्रसन्न भावसे सेवा करने के लिए तैयार रहो (E) संघमें यदि अब्भुट्टेयव्वं भवति ५ साहम्मिताणमधिकरणंसि कोई कलह हो जाय तो बिना किसी पक्षपातके मध्यस्थभाव उप्पएणंसि तत्थ अनिस्सिनोवस्सितो अपक्खगाही से शान्त करनेके लिए तैयार रहो। मन्मत्थभावभूते कह ए माहम्मिता अप्प सहा अप्प भगवान महावीरके सिद्धान्तोंका पूर्णतया विवेचन झंझा अप्प तुम तुमा उवसामणताते भव्भुट्टेयव्वं करनेका यहाँ अवकाश नहीं है। मात्र संक्षेपमें दिग्दर्शन भवति । कराया है। भगवानकी लोक-परलोक-हितकारी शिक्षाप्रोके उपरि लिखित सूत्रका संक्षेपमें यह भाव है कि पाठ ऊपर चलकर हर कोई श्रात्मा स्वनिष्ठ सद् गुणोंका विकाश धर्म प्रवचनोके लिए सम्यक्तया चेष्टा करनी चाहिए यल कर अन्तमे अजर अमर निर्वाण पदका अधिकारी हो सकता करना चाहिए, पराक्रम करना चाहिए, किसी भी कालमे है ? और निर्वाण पद प्राप्त कर सदा काल के लिए दुःखोंसे प्रस्तुत विषयमें प्रमाद न करना चाहिए। जैसे कि-(१) मुक्त हो अनन्त आत्मसुखोमे लीन हो जाता है। यही अश्रुत धर्मतत्वोंको सुनने के लिए तैयार रहो (२) श्रुत धर्म भगवान महावीरका सिद्धान्त है। मोक्ष तथा मोक्षमार्ग (लेखक-६० बालचंद्र जैन काव्यतीर्थ) इस परिवर्तन-स्वरूप संसारमें यह प्राणी मोहनीयकर्म प्रकारका अधिक दुःख है साथ २ उन दुःखों को दूर करने के वशीभूत होकर प्रात्मस्वरूपसे अनभिज्ञ होता हुश्रा का प्रयत्न करता भी है परन्तु विचारणीय बात तो यह है अनादिकालसे परिभ्रमण कर रहा है। यद्यपि इस परि. कि यदि कोई राहगीर पूर्व दिशासे चलकर प श्रम दिशाम भ्रमण में इसे दुःखके सिवाय सुखका अंशमात्र भी अनुभव स्थित सुखी पुरुषों के साथ रहकर सुखमय जीवन व्यतीत तब तक नहीं हो पाता है जब तक कि यह प्रारमस्वरूपका करना चाहता है किंतु चलता है वह उत्तर दिशाकी ओर, ज्ञाता नहीं हो जाता है। किन्तु मारमस्वरूपकी जानकारीके तब फिर वह किस प्रकारसे सुखी बन सकता है। यही बात लिये मोहमीय कर्मकी मंदता नियामक है, अर्थात जब तक है कि यह प्राणी सुखी बननेके लिये नवीन कर्मोंका बन्ध मोहनीय कर्मकी कुछ प्रकृतियाँ उपशम, क्षय, या क्षयोप. कराने वाले कार्य करता हुत्रा चला जाता है, यह नहीं शमभावको प्राप्त न होगी तब तक मारमस्वरूपका ज्ञाता सोचता कि इस मार्गसे मैं सुखी बन सकता है या नहीं? नहीं बन सकता है। यही कारण है कि मोहनीयकर्मक निश्चित बात तो यह है कि जहां कर्मबन्धके कारण आधीन होकर यह जीव परपदार्थों में मिजस्व बुद्धि रखता मौजूद है वहां सुख नहीं! इस लिये सर्वप्रथम नवीन हमा सुखी बनना चाहता है, सोचता है कि मुझे अमुक २ कर्मबन्ध न होने पावे यह ध्यान रखना पड़ेगा, अर्थात्
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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