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________________ किरण :-१०] श्री श्रमण भ० महावीर और उनके सिद्धान्त न्यभास्वरे प्रतिगता: सन्त: स्वसन्बन्धिद्रव्याकारमाविभ्राणा: पूर्णतया पवित्र एवं स्वच्छ नही बना लेता तबतक मोक्ष श्यामरूपतया परिणमन्ते निशि तु कृष्णाभा: एतच प्रारति नही प्राप्त कर मकता । मोक्षप्राप्तिमें मुख्य कारण ध्यान दिवसे सूर्यकरनिकरे निशि तु चन्द्रोद्यनि प्रत्यक्षएव सिद्धं ही है। ध्यान योग विद्याका मुख्य अङ्ग है इस पर बहुत त एव छाया परमाणव: श्रादर्शादिभास्वरद्रव्यपप्रतिगताः कुछ प्रकाश डालने की आवश्यकता है परन्तु स्थानाभाव सन्त: स्वमम्बन्धिद्रव्याकार मादधान्तः यादृगवर्णः से भी अधिक नहीं लिखा जारहा है। यदि कभी फिर समय. स्वमम्बन्धिनि द्रव्ये कृष्णो नील: सित: पीतो वा तदामा मिला तो इम पर विशेषरूपसे लिखा जायगा। परिणमन्ते एतदन्यादर्शादिष्वध्यक्षतः सिद्धं ततोऽधिकृत- भगवान महावीर साधारण साधको की तरह शुष्क सूत्रेऽपि ये मनुष्यस्य छायापरमाणव आदर्शमुपसंक्रम्य क्रियाकाण्ड तक ही अपने उपदेशों को सीमित नहीं रखते स्वदेहवर्णतया स्वदेहाकारतया च परिणमन्ते तेषा तत्रो- थे, उन्होने तपको सर्वप्रथम स्थान न देकर अध्ययनको पलब्धिर्न शरीरस्य ते च प्रतिबिम्बशन्दवाच्या:"इत्यादि । दिया है। आपका कहना था कि पहले पढो फिर चिन्तन उपर्युक्त वृत्तिका संक्षेपमे यह भाव है कि छाया- करो और बादमे तपश्चरण करो। तथा च सूत्रम्परमाणु ही श्रादर्श दर्पणमें उपसंक्रान्त होकर स्वशरीराकार तिविहे भगवता धम्मे पं० सं० सुअधिज्झिते रूपमें परिवर्तित होजाते है । अाधुनिक समयमें उक्त दर्पण- सुज्झाति ते सुत वस्सिते । जया सुअधिभितं भवति गत छाया परमाणुओंको ही स्थिरीभूत कर फोटू उतारे जाते तदा सुज्झातितं भवति जया सुज्झातिनं भवति तदा हैं। यह एक उदाहरण है भगवान महावीरने इसी भाति सुत वस्सियं भवति । से सुअधिज्झिते सुज्झातिते सुत द्रव्य गुण तथा पर्यायों के वास्तविक स्वरूप जाननेको वस्सिते सुतक्खाते णं भगवता धम्मे पराणत्ते । ज्ञान बतलाया है । इन पर विशुद्ध विश्वास -स्थानाङ्ग तृतीय स्थान करनेका नाम दर्शन है तथा कमों के प्रास्त्रवको उपयुक्त सूत्रका यह भाव है कि साधकको प्रथम रोकना चारित्र हे एवं सचित कर्मकी निर्जरा करना तप है। विधिपूर्वक योग्य गुरुजनोके पास शास्त्रोका अध्ययन श्रागममे कहा है : करना चाहिये, तदनन्तर पठित शास्त्रोका गम्भीर दृष्टिसे नाणेण जाणइ भावे दंसणेण य सदहे। चिन्तन करना चाहिये, तत्पात् निष्काम तप अङ्गीकार चरित्तेण निगिण्हाइ तवेण परिसुज्झइ ॥ करना चाहिये । जब तक विधिपूर्वक शास्त्रों का अध्ययन -उत्तराध्ययन २८ । ३७ नही होगा तब तक सम्यक् चिन्तन नही होगा और जब तक ज्ञानके द्वारा पदार्थों की जानकारी होती है. दर्शनके द्वारा सम्यक्तया चिन्तन नहीं होगा तब तक सम्यक रूपसे श्रद्धान होता है, चारित्रके द्वारा कर्मास्रवो का निरोध तपश्चरण नहीं होगा। होता है और तपके द्वारा संचित कोका नाश होकर अाजकलका जैन समाज यदि भगयानको प्रस्तुत प्रात्मशुद्धि होती है। सन्देशको आचरणम उतारे तो अवश्य ही उन्नति के भगवान महावीर तपश्चरण के उग्र पक्षपाती थे, शिखरपर श्रारूढ़ हो जाय, आजका शिक्षाशून्य जैन न तो श्रापका सर्वोपर शिक्षण अन्त में इसी सिद्धान्त को लेकर इस लोक की ही आराधना कर पाता है और न परलोक होता था । तत्कालीन बौद्ध सङ्घके प्रवर्तक भगवान बुद्ध की दी। भगवान महावीरको इसी लिए 'दीर्घ तपस्वी' के नाम से भगवान महावीर की शिक्षाएँ केवल परलोकके लिए सम्बोधित करते थे । परन्तु इसका यह अभिप्राय नहीं कि वे काममे पाने वाली भिक्षोंकी ही चीजे हो सो बात नहीं। अनशनरूप तप का ही उपदेश करते थे, उनके पास दूसरी उनकी धर्मशिक्षाएं वर्तमान जीवनको भी समुन्नत बनानेके कोई साधना न थी । भगवान जहाँ अनशनरूपका कथन लिए पर्यत है यदि हम उन पर चल पड़ें नो ? स्थानाङ्ग करते बहाँ ध्यान तप पर भी अधिक बल देते थे उनका सूत्रके अष्टम स्थान में भगवान बतला रहे हैंकथन था कि जब तक साधक शुक्लध्यानके द्वारा आत्माको अहहिं ठाणेहिं संमं संघडितव्यं जतितव्वं परक्कमि
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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