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________________ वीरके वैज्ञानिक विचार ( लेखक-1० धन्यकुमार जैन, एम० ए०, जेन दर्शनशास्त्री) इसके पहिले कि हम इस विषयपर कुछ भी लिखने निश्चित करने के लिये विचार करने लगे। उन्होंने विचारा के लिये लेखनी चलावें उस परिस्थितिका दिग्दर्शन कराना 'बड़े होते हुए छोटा कार्य करना कोई आश्चर्यकी बात नहीं अनुचित नहीं सभमते जिसका कि सामना भगवान वीरको है लचाधिपति होते हुए सैकड़ों हजारों रूपये लुटा देना, नहीं व्यक्ति वीरको करना पड़ा था। एक सहज काम है, मन भर बोझा उठानेकी सामथ्र्य रखने जब वे जीवनके कार्यक्षेत्र में उतरे, उनके सामने एक वाले व्यक्तिके लिये दस सेर बोमा उठाना बायें हाथका समस्या प्रान खड़ी हुई। वे चलते २ ऐसे स्थनपर मा खेल है। इसी प्रकार भगवान होते हुए, अवतार ले कृत्यों खडे हुए जहां उन्हें एक नहीं अनेक मार्ग दृष्टिगोचर होने द्वारा पुरुषोत्तम बन जाना, उससे प्रशशित व पूज्य बनना जगे। वे इस विचारमें पड़े कि इस सम्ते जाउँ मा उन उचित नहीं है। ऐसा प्रदर्श प्राप्माको उन्नत बनाने के राम्तोंसे जाउँ। बजाय पतनोन्मुखी बनायेगा। वह सिर्फ जनताको धोखेमें एक मत कह रहा था कि अगर मुक्त होना बहते हो डालना कहलायेगा" मानध वीरने इसको हेय समझ, तो हमारी खुशामद करो, चापलूसी करो, भक्ति करो, पूजा तार्किक बुद्धिका अवलम्बन ले दूसरा मार्ग अपनाया। उन्हों करो, हमारी ही शरणमें पात्रो (मामेक शरण बज) हम ने नारायणमे नर होनेकी अपेक्षा नरसे नारायण बननेको तुम्हारा उद्धार कर देगे तुम्हे वैकुण्ठवासी बना देंगे। ज्यादा हितकारी एवं श्रेयस्कर समझा । स्व सुकृत्योंमे दूसरा मत कह रहा था किसीकी खुशामद चापलूमी अपने व्यक्तित्वको ऊँचा उठाया, ध्यान, साधना और तपके करनेकी आवश्यकता नहीं, किसीकी शरण-भरण में जानेकी बलसे अपनी अंतर्ज्ञानज्योतिको जागृत किया और इस जरूरत नहीं। अपनी मुक्तिके लिये दूसरे पर आश्रित होना प्रकार स्वयं भगवान बन गये। आज इन निम्न लिखित अपनेको निकम्मा एवं मालसी सिद्ध करना है। तुम स्वय पंक्तियोमें हम उन्हीं वीरवर वैज्ञानिक वीरके विचारोंपर ही स्वयंके उद्धारके लिये प्रयत्नशील होश्रो, सफलता या विचार करेंगे। मुक्ति बद्धहस्त हो तुम्हारा स्वागत करेगी। भाग्य और पुरुषार्थ के बीच में लटकने वाली प्रामाके उनके उपदेष्टा या प्रवर्तक भिन्न व्यक्ति थे। एक बडे लिये उन्होंने उपदेश दिया कि कर्तव्य-परायण बनो छोटा बना, संमारमें अवतारी पुरुष कहलाया और अपने "Work is worship" को अपना लक्ष्य एवं ध्येय अलौकिक कृत्य दिखला जनताको आदेश देने लगा मुझे बनायो । भाग्यवादी होना अपने में पुजदिली एवं कायरता बड़ा मानो, मेरी पूजा करो, मैं तुम्हारा उद्धार कर दूंगा। पैदा करना है। यह मनुष्य जो भाग्याश्रित हो अपनी दूसरेका प्रवर्तक हम श्राप सरीखा दो हाथ पैर वाला जीवनपात्रा करता है यह नर-कंकालको धारण कर स्वयं व्यक्ति था उसने अपने स्वरूप व शक्तिको पहिचाना, भज्ञान को पतित एवं निरुद्यमी सिद्ध करता है। अपनी मुक्तिके के पर्देको हटा कतव्य पथपर चल अपनी उन्नति करने लिये पराश्रित होना अपना अस्तित्व नष्ट करना है। अपने लगा। उ अतिके अंतिम शिखरपर पहुँच जनतासे निवेदन ही कृश्य स्वयके उद्धार । वं पतनके कारण होते हैं अत: करने लगा कि तुम भी मुझ सरीखे उन्मत हो सकते हो यह सोचना कि "भगवान हमारा उद्धार कर देगें" अपने बराते कि परका प्राप्सरा छोड स्वावलबी बनो और कर्तव्य आपको जिम्मेदारीसे मुक्त करनेका असफल प्रयास कह. कर्म करने के लिये पिल पड़ो। लायेगा। बबूल के बीज बोकर पाम्रफलकी आशा करना श्रीवीर दोनों मागंका अवलोकन कर अपना पथ प्रारमप्रवंचना मात्र ही होगा। प्रत: "पराधीन सपने हु सुख
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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