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________________ १३८ अनेकान्त [ वष ७ .हैं. एवं स्वयं प्रात्मा ही सपूर्ण इन्द्रियों का कार्य करने शक्ति है जो उत्थान और पतन-जैसी जिसकीसंगति होबगती है। हमारा ज्ञान परावलम्बी है- यदि हम एक भी की ओर, प्रत्येक प्राणीको प्रवृत्त करती है। असंतोषसे एक इन्द्रियसे पगु हों तो उसके विषयका रसास्वादन स्वममे भी दुख होता है जिससे कुपित होकर वह, सुख-संतोष दृढता सम्भव नहीं, परन्तु प्रात्माको इन बाह्य श्रायोजनोंकी है, और यह सब उस प्रचण्ड और बलवती प्रेरणासे होता किंचित् भी मा.श्यकता नहीं होती-वह संसारकी पारी है, जिसके मूल में स्पर्धा समाहित रहती है, और वह उस प्रवृत्तियों, सारे परिवर्तनोंको हस्तामलकवत जानती है। के साथ की जाती है जिसके निकट सुम्ब-संतोष अधिक कभी कभी हमें किसी बातका अथवा अनुभवका ऐसा मात्रामे रहता है। इस दृष्टिसे कह सकते हैं कि जिस प्रकार अस्मीय प्रानंग होता है कि तनके रोम रोम पुलकित हो निराशामें प्राशा, रश्मिमें प्रकाश, विलास में काम, घनमें उठते हैं। जहां जरा-सी बातमे ही इतना अलौकिक प्रानंदा- विद्युत और वेदनामें अश्रु अभिन्न भावस सन्निहित रहते हैं, नुभव होता है, वहां जगतके सपूर्ण व्यापारोंका एक उसी प्रकार दुखमें भी सुख विद्यमान रहता है। यदि हमें साथ अनुभव करने वाले महामाको किस कोटि दुख, अतृप्ति और असंतोषका अनुभव न हो, तो यह स्वम का आनंद होता होगा-वर्णनातीत है । संक्षेपत: उसे में भी विभर करना कि सुखकी ओर अग्रसर होना है, 'मनन्त सुख'-प्रखण्ड सुख कहकर मनस्तुष्टि कर सकते हैं! निग दंभमान होगा। प्रत्युत इसके, दुख तो दुख ही है । सारा सपार ही किंतु एक बात ध्यान में रखना आवश्यक है । यदि उसकी धू-धू करती ज्वालाप संतप्त हो रहा है । परन्तु हमारा दुग्व और असंतोष उदासीनता-निराशामें परिणत दुख भी सुख ही है-दुखको सुखका पर्यायवाची शब्द ही होजाए हम किंकर्तव्यविमूढ बन जाएं तो समझ लीजिए समझना चाहिए क्यों ? स्वाभाविकत: प्रश्न प्रस्तुत होता है! निश्चय ही हमारे भाग्यका सुख-सिंदूर पुंछ रहा है। असं. मनुष्य जब अति मह्य दुखके भारपे दब जाता है, तोष अथवा अतृप्ति हो तो हमें पूर्णत्वकी ओर अग्रसर होने तब ही उसे क्रान्ति मूझती है-वह अपने हितको मार्ग का सबक सीखने को मिलता है । वह तो हमारे भाग्यखोजनेके लिए व्यग्र हो उठता है। जब तक वह श्राराम परिवर्तन के लिए समय प्राप्त करनेकी एक चेतावनी है, खाता, पीना और मौज उड़ाता है, यह सोचनेकी परवाह घण्टी है, यदि हम उसकी आवाज सुनकर सायपर जाग भी नहीं करता कि मेरा हित किममे कहां और क्यों है? गए और अपने कर्तव्यपर डट गए तो दुनियाकी ऐसी णेरा कर्तव्य क्या है ? मैं इस समय किस पथका पथिक कोई शक नहीं जो हमारे वीचमें रोडा अटका सके. परन्तु हूँ? क्या मेरे कार्य-व्यापार उचित हैं, हेय नहीं ? संसार चाहिए उसके लिए साहस, धीरता, और पुरुषार्थ । और इस समय किस परिस्थितिका अनुभव कर रहा है ? एक यदि नही जागे, अपने उस अमूल्य क्षणको नगण्य समझ नौकरको हम जब तक उसके जीवन-निर्वाहके लिए पर्याप्त यों ही 'काग उडावन मणि' के समान खो दिया. तो कर्म पारिश्रमिक देते रहेंगे, तब तक उसके हृदयमें अनिष्टकी, महारिपुत्रों की जोरदार फटकार और जीवन-पृष्ठोंगर बेतोकी संदेहकी या विनाश की कल्पना भी प्रसूत नहीं हो सकती, बतास एवं पाप-पुण्यमबा जंजीरें तैयार ही हैं-इस वह अपना कार्य पूर्ववत, पूर्ण जिम्मेदारी और ईमानदारीके समय भी संसारकी कोई शक्ति छुड़ाने में समर्थ नहीं होसकती। साथ किए चला चलेगा। परन्तु जहां उसकी आवश्यकताएं अंतमें पाठकोंका ध्यान, विशेषरूपसे कविवर पं. बढ़ीं और व्यय का परिमाण वृद्धिंगत हुआ तथा हाथमें दौलतरामजीके निम्न पद्यांशोंपर आकृष्ट कर, उसे गंभीरताद्रग्य न रहा तो वह निस्संकोच होकर, उसी मार्गपर पूर्वक मनन और अध्ययन करनेके लिए भूत कर, इम पारूढ़ होगा जिसे सभ्य भाषामें 'चोरी' कहते हैं । यही प्राशा और इच्छाके साथ कि विद्वान लोग प्रस्तुत विषयपर हालत प्रत्येक मनुष्यकी होती है-उसे सिखानेकी श्राव. सुंदरसे सुंदर विचारों को प्रकट करेंगे, निबंध समाप्त करता हूँ। श्यकता नहीं होती। 'पातमको हित है सुख, सो सुख, प्राकुलता बिन कहिए।' अतृप्ति अथवा असंतोष ही एक ऐसी अलौकिक पुण्य-पाप-फल माहिं हरख बिजखी मत भाई!'
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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