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________________ किरण ६-१०] सुख और दुख १३७ है कभी भी स्थ यी सुखप्रद नहीं हो सकतीं।" प्रतएव हालतमें न खाना सूझेगा न पीना न पहनना सूझेगा न यह निश्चित रूपेण स्पष्टतासे कहा जापकता है कि स्थायी प्रोढ़ना, रातका अनुभव होगा न दिनका, वह अवस्था ही सुख उस भावना या मानन्दका नाम है जिसमें इच्छा, एक विचित्र दशा होती है। उसमे एक बार जो तल्लीन हो अभिलाषा, मोह. राग और द्वेषका पूर्णतया प्रभाव हो। जाता है, यदि उसके शरीर परस भयानक विषधर भी गुजर सचा सुख निर कुलत.मय है। जाय, उसके शरीरको जंगलके मृगगण पत्थरकी दीवान उपर्युक्त पक्तियोंमे, यह तो हम स्पष्ट रूपसे निरख ही समझ कर खाज खुजलाते हुए खिपक जाय तो चुके कि निराकुलता ही सुख है। अब प्रश्न यह रह जाता उस प्रारमध्यानो महामाको तनिक भी भय तो क्या, है कि वह है कहां? सपारमे तो सुख है नहीं. अत: वह भामास भी नहीं होता कि इतनी देरमें मुझपर क्या क्या कहीं तो भी हमके परे ही होना चाहिए, यह जाननेकी बीती है। उसे अपने ध्यानानन्दमें यह भाव ही नहीं होता निशामा सहज ही उद्भूत हो उठती है। कि मैं कहां हैं. मेरा शरीर कैसा है ! इस ध्यान ही ध्यानसे एक विद्वानका अभिमत हैं कि-"सुख मनसे सम्बन्ध एक समय वह पाता है जब उसके हृदयके सारे विकार, रखता है, प्रायोजन या पाडम्बरसे नहीं।" जहां प्रायोजन सारा मनोमालिन्य, मोह ममता, ग्यानामनकी धधकती और आडम्बर, इच्छ। और अभिलाषा राग और द्वेष, ज्वालामें भस्मीभूत होजाते हैं और हृदयमें "वसुधैव बड़प्पन और अभिमान, कोच और माया लोभ और मोह कुटुम्बकम्" का तेजोमय अखण्ड प्रकाश विश्वप्रांगणापर का साम्राज्य छाया हुभा होगा, वहाँ सुखकी पाहदकारी प्रकाशित एवं भालोकित हो उठता है। एक हिंदी कविके पताका, जो शांति और निराकुलनाके पुनीत साम्राज्य की कथनानुसार उस ी यह दशा होजाती है-- प्रतीक है, नहीं फहरा सकती । जब तक मन और हृदय "अरि-मित्र, महल-ममान, कंचन कांच, निन्दन थुतिकरन। विकारशून्य नहीं हो जाते, "तेरा-मेरा" के चरपरे विचार अर्धावतारन, अमि-प्रहारनमें सदा ममता धरन ॥" चूर-चूर नहीं हो जाते, तबतक सुखका अनुभव कैसा? उपरांत इसके, एक समय वह पाना है जब उसके सुग्य तो वहां है, जहाँ प्राकुलता नहीं, निराकुलता है। समस्त अज्ञान मेघ, निरंतर समता-सुधाका पान करते २, जहाँ निराकुलता है, वही शांति, संतोष और अनंदकी एक दम नष्ट हो जाते हैं और ज्ञान सूर्यका दैदीप्यमान स्थिति है। हम तनिक मणके लिए भी गार्हस्थिक झंझटोंसे मालोक, अनन्त लोकमें व्याप्त हो उठता है। इसे संपूर्ण हटकर यदि एकान्तमे जा. निर्विकार और निराकुज हो. ज्ञानदशा कहते हैं, जिम जैन धर्म में 'केवलज्ञान' कहा प्रारमाके स्वरूप और प्रकृतिकी सुंदरताका सहृढयतापूर्वक गया है। इस सुदशापर पहुँचने के पश्चात, जिस अश्रुतपूर्व निरीक्षण और चिंतन-मनन करें तो ज्ञात होगा कि कितना सुखका अनुभव उसे होता है, वह लेखनी और वाणीके अलौकिक, अभूतपूर्व और स्वर्गीय सुखका हमें अनुभव घेरेसे आबद्ध नहीं। इस सम्बन्धमें मनम्तुष्टि मात्रके लिए, होता है। केवल इतना ही कथन पर्याप्त होगा कि जहा इमाग ज्ञान यह तो एक चणिक समय मात्रकी बात हुई। परन्तु इंद्रियोंके वशीभूत होकर सीमित द्रव्य, क्षेत्र, काल और सदा ही ऐसी अवस्था तो संसारमें रहकर उपलब्ध नहीं भावको लिए हुए है, हम जितना कुछ मनन, चिंतन, हो सकती, बिना चिंता और प्राकुलताके काम ही नहीं जो अवलोकन विश्लेषण इन इंद्रियों द्वारा देख, सन, सूध, चता यहांका । इसीलिए एक सूक्ष्मदर्शी साधक कपिने चख और स्पर्श करके कर सकते हैं, उससे भी कम उसे उस सुख के स्थल का संकेत अपने शनोंमें यों किया है- समझ सकते हैं अर्थात विश्वके सम्मुख उसे संपूर्ण सत्य "प्राकुलता शिवमानि ताते, शिवमग लाग्यौ हिये।" रूपसे उपस्थित भी नहीं कर सकते-प्रत्येक विषय गुगेका ___ यदि हम अग्ने अापको-प्रारमाको-शिव( मुक्ति) गुड होकर रह जाता है। वहां, उन ज्ञानियों-केवलज्ञानियों की ओर आकृष्ट करेंगे, भारम-ध्यानमें तल्लीन होंगे और की समस्त इंद्रियां-सुख और ज्ञान-प्राप्तिके समस्त बाह्य निरन्तर प्रारमसरूपके चिन्तनमें ही मन्न रहेंगे तो उस साधन-मत्युमुखमें पहुंच जाती हैं-निष्क्रिय हो जामी
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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