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________________ १३० अनेकान्त [वर्ष ७ अतःन केवल मामशांति प्रत्युत विश्वशांति के लिए भी इसके सिवाय उन्होंने यह भी बतलाया कि सम्पूर्ण दुर्भावनाओं एवं प्रयानोंका त्याग ही एकमात्र उपाय है।" प्राणियों में परमात्मा बननेकी शक्ति है। अत: उसे काममे यह थी पहली घोषणा जो भगवान महावीने विश्व- खाकर कोई भी प्राणी परमात्मा बन सकता है, और उसकी कन्यागकी पवित्र भावनासे प्रेरित होकर विश्वको प्रदान यही अवस्था वास्तविक पानंद प्रदान कर सकती है। इसके की। आगे चलकर संसारके गंप्रदायिक कलहों एवं प्रज्ञा- खिये धर्म पुरुषार्थकी आवश्यकता है। और धर्म वही है नताको नष्ट करके सम्यक्ज्ञानको प्राप्त करने के लिए उन्होंने जिसे हम सम्यक्दर्शन-ज्ञान-चारित्रकं नाममे या श्रद्धा, ज्ञान को सदेश दिया बह था हएिकोणको निष्पक्ष एवं उपचार और सदाचर कहकर पुकार सकते हैं। उन्होंने बताया कि बनानेका । उन्होंने बताया कि तुम्हें यदि वस्तुतत्वका पूर्ण मतो केवल श्रद्धा रखने मात्रसे कोई मुक्त हो सकता है और गस्तविक ज्ञान प्राप्त करना अभीष्ट है तो वस्तुको और न केवल ज्ञान अथवा भाचरण मात्रसे. प्रत्युत इन प्रत्येक दृष्टिमे देखनेका प्रयत्न करते रहकर उसके प्रत्येक तानोंके एक माथ पालन करनेसे ही मुक्ति मिल सकती है। गुणपर विचार कर निष्पक्ष भावसे जानते चले जाओ, तो जितने अशीमे कोई इनका पालन करता है उतने । तुम्हारा ज्ञान संकुचित न होकर विशाल और वास्तविक में वह सुख और शांतको प्राप्त करता हुआ एकदिन अपने बनकर विकमित होते हए एक दिन पूर्णताको भी प्राप्त हो काका सम्पूणत: नाशकर परमात्मा बन ही जाता है। सकता है । सांप्रदायिक पक्षपात पूर्ण मनोवृत्ति सदा ही परमात्मा कोई ऐसा ईश्वर नहीं है जो दुनियाको सुख दूषित, संकुचित एव अनुदार हुश्रा करती है, जिससे मनु दुख देता हो या किमीको मारता जिलाता अथवा सृष्टकी योंके ज्ञानका विकाम तो रुकता ही है, साथ ही उसका रचना और प्रलय करता है । परमात्मा तो वह पवित्र वह संकुचित अधूरा ज्ञान भी पक्षपात पूर्ण होनेके कारण पारमा है जो अपने सम्पूर्ण दोषो और कमियोंको नष्टकर अवास्तविक हो जाता है और विवादका कारण बनकर म्वाभाविक गुणों (अनंत ज्ञान, दर्शन, सुख एवं शक्ति) को विश्वमें अशांति फैलाता व नासमझ और भोले लोगोंको व्यक कर सच्चिदानद अवस्थामे जीन रहता है । वह रागी । भममें डालकर उन्हें भी दृषिन मनोवृत्तिका बमा डालता द्वेषी कामी, क्रोधी, लाली आदि नही है। परमात्मतत्व ।अतः प्रत्येक मनुष्य को उसके कल्याणकी दृष्टिमे यह की दृष्टि से परमात्मा एक और संख्याकी दृष्टिसे अनेक हैं। आवश्यक है कि वह पस्यको, अपना समझकर उसे मानावे. न कि अपने जाने और माने हुए अधूरे एवं संकु दुनियाके प्रत्येक व्यक्तिको विना किमी भेदभाव चित ज्ञानको ही पूर्ण ज्ञान कहकर हठ करे । यदि वह परमारमा बना देनेका मार्ग प्रशस्त करते हुए विश्वप्रेम, अपनी संकुचित दृष्टि बनाकर वस्तुके आंशिक ज्ञानको ही पेवा स्याद्वाद, सदाचार अहिमा साम्यवाद प्रादिसे श्रोत पूर्ण ज्ञान कहेगा तो इसमे पदार्थके स्वरूपको तो कुछ प्रोत सुखमय संदेश सुनाकर भगवान् महावीरने जो विश्व हानि पहुंचती नहीं, अलवत्ता उसकी मूर्खता अवश्य पुष्ट का चिरकल्याण किया है उससे कोई भी समझदार व्यक्ति हो जायगी। इसी ज्ञानात्मक निष्पक्षताको उन्होंने 'अने कृतज्ञ हुए बिना नहीं रह सकता । विश्व कल्याण के लिए कांतवाद' या 'स्याद्वार' के नामसे व्यवहत कर सम्यकज्ञान भाज उनके सिद्धान्तोंके प्रचारकी कितनी पावश्यकता है, को प्राप्त करने व मांप्रदायिकताको नष्ट करनेका वास्तविक इसे उनके धर्मके अनुयायीगण शायद अभी नहीं समझते। पाठ दुनियाको पढ़ाया। स्वयं मोहकी प्रज्ञानमयी निद्रामें प्रसुप्त हैं!
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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