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________________ किरण ६-१०] भारतीय इतिहासका जैनयुग १२३ स्वतन्त्र होगया था। विन्दुसारके शासनकाल में कलिङ्गमें प्राचीन और सबसे अधिक उपयोग जैन साहित्य एवं फिर एक क्रान्ति हुई प्रतीत होती है। प्राचीन चेदिवंशके पुरातत्व में ही मिलते हैं। स्थानमें किसी आततायी और उसके वंशजोका शासन रहा। सम्राट विक्रमके पश्चात् कुछ समय तक गुजरात के सम्राट सम्प्रतिके अन्तिम दिनोंमें वहाँ चोदवंशकी पुनः शकोका अचन्तिपर अधिकार रहा। रुद्रसिह, रद्रदामन, स्थाप हुई। इस वंशका प्रसिद्ध सम्राट महामेघवाहन जयदामन, नहपान श्रादि ये शक छत्रप भी जैन ही थे। खारवेल था। समस्त भारतको इसने अपने प्राधान कर इन शकोका उच्छेद अन्तिसे प्रान्ध्र राजोंने किया और लिया। मगधको भी विजय किया, पुष्यमित्र शुङ्ग, उसके यह बान्ध्र राजे भी अनार्य तथा जैन-धर्मानुयायी ही थे। सामने नतमस्तक हश्रा युनानी दमित्रको उसने देशसे दसरी शतान्दी ईस्वीमेश्राम्ध्र बंशके अम्त तथा ४ थी बाहिर खदेड भगाया, सातकणी आन्ध्र, भोजक, राष्ट्रिक शताब्दीमे गुप्तवंशके उदयके बीच महारथीनामक नाग एवं श्रादि सर्व राजे उसके श्राधीन थे । खारवेल जैनधर्मका दृढ़ वकातक सदार प्रबल रहे उन्हींका आधिपत्य अधिकाश अनुयायी था। उस धर्मके प्रचार प्रभावनाके लिये उसने मध्य तथा दक्षिण भारतपर रहा। ये नाग गजे प्रायः सर्व सतत प्रयत्न किये। जैन मगध-साम्राज्यके उपगन्त जैन ही जैनधर्मानुयायी थे। उनकी नागभाषा (प्राकृत व अपकलिङ्गसाम्राज्य हुश्रा। इस प्रकार उत्तरीभारतम सन् ३० भ्रश) जैन साहित्यका ही मुख्य भाषा था। उक्त नागयुगमें पूर्वकी २रीशताब्दीके मध्य तक जैनधर्मको ही प्रधानतारही।' जैनविद्वानोने नागरी लिपिका अविष्कार किया, जैन शिल्प मालव अथवा अवन्तिमें महावीरकालमे प्रद्योतवशका कारोंने जेन मन्दिगेमे नागरशैलीका प्रचार किया। राज्य था । वहाका प्रसिद्ध राजा चंडप्रद्योत तथा उसका पुत्र अच्छ अथवा अश्मक दक्षिणभारतके उत्तरपूर्वका पालक जैनधर्मानुयायी थे। नन्दिवर्धनने अवन्तिको विजय प्रदेश था। इसकी राजधानी पोदनपुर जेनोंका एक पवित्र कर अपने राज्यका सूबा बनाबा, इसका उत्कर्ष मगधसाम्राज्य स्थान अति प्राचीनकालसे रहा है। सम्राट खारवेलकी के अस्त होने के पश्चात् वरन् खारबेलकी मृत्युके उपरान्त मृत्युके पश्चात् कलिड वंशकी ही एक शाखाका यहा राज्य प्रारंभ हुआ। खारवेलके पश्चात् उसके ही एक वंशजने । रहा । इसी कारण यह प्रान्त त्रिकलिङ्गका दक्षिणा अवन्तिमे जो खारवेलके राज्यका एक सूबा थी, स्वतन्त्र कलि कलाम कलिङ्ग कहलाया। नागयुगमें यह प्रसिद्ध फणिमण्डल के राज्य स्थापन कर्रालया। अब उत्तर भारतकी कन्द्रीय शक्ति अन्तर्गत था और प्राचार्यप्रवर, सिंहनन्दि, सर्वनन्दि, मगध न रह गया था वरन् श्रवान्त हो गई थी। अस्तु; समन्तभद्र, पूज्यपाद श्रादिका कार्यक्षेत्र था । वादको यह तत्कालीन महाराष्ट्रक श्रान्ध्र, पद्मावती भोगवतीक नाग, प्रान्त पहले पल्लव फिर गणवाडीक जैन गजराज्यमें गुजरातके शक छत्रप सर्व ही अवन्तिपर दाँत लगाये रहते सम्मिलित होगया। थ। तथाप लगभग डेढसौ वर्ष तक बहा जैन गर्दभिल्ल । जन गदाभल्ल वच्छ अर्थात् वत्स देशकी राजधानी कौशाम्बी थी। वंशका ही राज्य रहा। प्रसिद्ध सम्राट प्रथमविक्रमादित्य, इसी नागो बल प्राय वाहनोज सिन गर्दभिल्ल वंशके थे। उनके पिताके अनाचारोंके कारण प्रादिने इस देश में अपना राज्य स्थापित किया था। किन्सु उनके जन्मसे पूर्व ही नवागत शकोंका अन्तिपर अधिकार माग समा ... हो गया था, किन्तु होश सभालन पर उन्हान शकाका दश भी ब्रात्यसंस्कृति मे रंगे गये और उन्होने जैनधर्म अङ्गीकार से निकाल बाहर किया। उनका शासन सर्व प्रकारस कर लिया । महावीरकाल में स्वप्नवासवदत्ताकी प्रसिद्धि कल्याणप्रद तथा श्रादर्श रहा । जैनाचार्य कालक सूरि वाला वत्सगज उदयन जैनधर्मका भक्त था। किन्तु उसके के प्रभावसे वह दृढ़ जैनधर्म भक्त हो गये थे। उन्हीकी एक दो पीढ़ी बाद ही मगधक शिशुनाग सम्राटोने वत्सको स्मृति में प्रचलित विक्रम संवत चला। इस संवतके सबसे विजय कर अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया। १ Kharvel's Inscriptione of the कच्छ अर्थात् काठियावार प्रान्तमें उस समय वर्तमान Orissa Caves. गुजरात तथा बम्बई प्रेजीडेन्सीका बहुभाग था। महाभारत
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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