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________________ अनेकान्त [वर्ष - श्राग्रह और अहंकारका उस उपदेशमें सर्वथा प्रभाव सकता कि एक दिन वह नहीं पाएगा, जब फूट और वैमथा। जहां यह दोनों प्रचस्थित होंगे, वहां स्वावलम्बन नस्य घर न कर लेगे ! अतएव, आवश्यकता तो आज इस और स्वतंत्रताके पैर ही नहीं टिक सकते । उस जगह तो वातकी है कि पहले भारतीय जनताके हृदयों में प्राध्यायही भावना होती है कि अपना बड़प्पन प्रदर्शित किया स्मिक स्वावलम्बन और स्वतंत्रताके उज्ज्वल विचारोंको जाय और इसके लिये अधिक से अधिक जनताको अपने विराजित कर उनकी प्रात्म-निष्ठा, प्रारम-दृढ़ता, पारम-तेज भधीन किया जाय ! और उसमे होनेवाले "प्रारमवत् सर्वभूतानाम्" "यतो धर्मराष्टीय दृष्टिपे भी स्वावलम्बन और स्वतंत्रताका बहत स्तता जयः श्रादि तरवाका उनम जागृत किया स्ततो जयः" आदि तत्वोंको उनमे जागृत किया जाय । महत्व है ! आज, विश्ववंद्य महात्मा गांधीजी तथा अन्य और, इसकेलिए, भ०महावीर स्वामी द्वारा दिए गए उपदेश राष्ट्रीय नेतागण स्वतंत्रता देवीका आह्वान करने में जुटे हुए का ही, जो स्वावलम्बन और स्वतंत्रताकी चरम अभिव्यक्ति हैं और उसके प्रागमनकी प्रतीक्षामें रात-दिन एक कर रहे करता है, अत्यन्त आवश्यकता है ! इसके बिना, राष्ट्रीय हैं, अपने खूनका पानी बना रहे हैं और बाजी लगा रहे हैं। स्वतंत्रता यदि प्राप्त हो भी जाय तो भारतीय हृदय आज वे चाहते हैं भारत हमारा है, इसपर पर-राष्ट्रीय शासनचक इतने कलुषित, स्वार्थपूर्ण और अहंकार परिपूर्ण होगये हैं चलाने के अधिकारी नहीं हैं, इसका शासन-सूत्र हमारे ही कि वे जरा भी चोट सहन करनेमे असमर्थ हैं। हाथों में होना चाहिए ! उनका प्रयत्न सराहनीय है, वे जो भ० महावीरने स्वतत्रताकी जो व्याख्या की है उसमे कुछ कर रहे हैं, अपनी शक्ति-अनुसार बहुत ठीक कर रहे निजत्वकी रक्षा तथा प्रारमीय स्वाधीनताका पुनीत अर्थ हैं। वे यह भी चाहते हैं कि घर-घरमें स्वावलम्बनका सनिहित है ! अतएघ यदि भारतको स्वतंत्र देखना है, प्रचार किया जाए, अपने ग्राम, नगर ओर प्रांत अथवा देश स्वाभिमानको बनाए रख मस्तकको ऊँचा रखना है तो हमे की बनी वस्तु ही खरीदी और व्यवहारमे लाई जाए। सबसे पहले मानसिक और अंधश्रद्धापूर्ण धार्मिक दुर्बलता परन्तु उनका प्रयत्न भी स्थायित्वको प्राप्त होसके, वैमा नही को दूर करना होगा और स्पष्ट स्वरमे यह अभिव्यक्त कर, कहा जा सकता। क्योंकि, सदियोंमे पड़े हुए संस्कारोंको विश्वको दिखा देना होगा कि हम उस वीर माताकी संतान मनसे निकाल डालना, कमय कम भारतीयोंके लिए तो तथा उस वीर धर्मक अनुयायी हैं, जिसने कि किसी ईश्वरसहज सम्भव नहीं है ! इनकी मानसिक और बौद्धिक साथ विशेषकी विश्व-सत्तापर भी पानी फेर दिया और जो ही शारीरिक दुबंजता इतनी तिस्तृन हो गई है कि वे बात ललकार कर स्पष्ट शब्दोंमें कहता है कि "प्रत्येक मारमा, बातमें रूदि. प्रथा या रिवाजका आश्रय ग्रहण करनेपर परमात्मा अथवा ईश्वर है, क्यो हम स्वतंत्रता प्राप्तिके नाम लाचार हो उठते हैं---उसके आगे उनकी दौड कठिन बन पर किसी ईश्वर-विशेषकी आराधना करें।" जाती है ! । इस लिए, कदाचिन् राष्ट्रीय शासन-स्वतंत्रता प्राइए एक बार सब मिलकर एक स्वरसे कहेप्राप्त हो भी जाए, तो यह निश्चयपूर्वक नही कहा जा 'स्वतंत्रता प्रचारक भ. महावीरकी जय' ।
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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