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________________ साहित्य परिचय और समालोचन (परमानन्द जैन शास्त्री) मजन भी ब्रह्मचारीजीका अनुकरणा करेंगे। तिलोयपरणसं हिन्दी नुवाद सहिन प्रथमभाग। ग्रंथ के सम्पादन में पति परिश्रम किया। मृललेखक, प्रा. यनिवृषभ, अनुवादक पं. बातचन्दजी ग्रन्थ सभीके लिये पठनीय और संग्रहणीय है। सिद्धान्त शास्त्री। सम्पादक, ड.० ए०एन० उपाध्याय एम. ए. डी. टि. कोल्हापुर और प्रो० हीरालालजी जैन एम.ए. एल., एल. पी. किंग एडवर्ड कालेज, भारतीय सम्पादन-शास्त्र, लेखक मूलराजजी जैन अमरावती। प्रकाशक, 'जैन संस्कृति संरक्षक संघ' शोला एम.ए. एल. एल. बी. तिमिल, श्री श्रारमानन्द जैन कालेज, अम्बाला शहर । प्रकाशक, जैन विद्याभवन, कृष्णगुर। पट संख्या मब मिला कर १७०। मूल्य मजिल्द प्रतिका १२)पया। नगर, लाहौर । पृष्ट संख्या ७० । यह थ जैनियोंके करणानुयोगका विवेचक प्राकृत प्रस्तुत पुस्तक में लेखकने अन्योंके सम्पादन सम्बन्धमें भापाका एक प्राचीन महत्वपूर्ण भौलिक ग्रंथ है। श्रा० छह अध्यायों द्वाग:काश डाला है तथा भारतीय ग्रन्थोंके यति तपमने इस ग्रंथको संकलन करते हए 'लोक विभाग' सम्पादनमें उपयुक्त साम्रग्रीका विवे-न भी किया है और और 'लोक विनिश्चय' जैसे प्राचीन ग्रंथोंके उद्धरगा और बतलाया है कि किसी ग्रन्थका सम्पादन करते समय उसकी अन्य ग्रंथोंके पाठान्तरादि द्वारा विषयका खूब स्पष्टीकरण प्राचीन और अर्वाचीन प्रतियों और प्रतिलिपियोंकासूचमतर किया है। प्रन्थका हिन्दी अनुवाद प्रायः मूलानुगामी है अवलोकनके साथ साथ मूल पाठकी सुरक्षित रखते हुए और उसे रुचिकर बनाने का प्रयत्न किया गया है । इससे दूसरे पाठान्तरोंको जो लिपिकारोंके प्रमाद श्रादि दोषोंस हो गए हैं उन्हें नीचे फुटनोटमें अंवित कर श्रादर्श प्रतिके स्वाध्याय प्रेमी भी यथेष्ट लाभ उठा सकते हैं। मूल पाठको पूर्णतया सुरक्षित रखनेवी और संपत किया है ग्रंथका प्रकाशन ब्र. जीवराज गौतमचन्दजी शोलापुर लिपि आदिक सम्बन्धमें भी विचार किया है। पुस्तक द्वारा संस्थापित 'जैन संस्कृति संरक्षक संघ द्वारा किया परिश्रमके माथ लिखी गई है। इसके लिये लेखक महानु गया है। ब्रह्मचारीजीने अपने मंचित द्रव्यको जैनमाहित्यके भाव धन्यवादाई है। पुस्तक पठनीय तथा संग्रह करने के उद्धारार्थ प्रदान कर अपनी महान उदारता और जिन वाणी योग्य है। की भक्तिका अच्छा परिचय दिया है। साथ ही, दूसरोंको इस प्रशस्त मार्गका अनुकरण करनेका यह एक प्रोत्तेजन है। दि. जैन साहित्यका बहुभाग अब तक अप्रकाशित ही जीवाममोमें अह-योग, ह.खक. उपाध्याय मुनि पहा है इतना ही नहीं उसकी एक प्रामाणिक ग्रन्थ-सूची आरमारामजी प्रकाशक, लालामुन्शीराम से का अभाव भी प्राय: खटक रहा है। ग्रंथ भंडारों में कितने प्रोसवाल, मुकाम जीरा जिला फीरोजपुर । पृष्टसंख्या सब ही अप्रकाशित ग्रंथ अपनी जीर्ण शीर्ण दशामें पड़े हुए मिला कर १०४ मूल्य माठ माना। हैं-किन्ही किन्हीं ग्रंथोंकी तो दूसरी प्रतिलिपियां भी प्रस्तुत पुस्तकमें स्थानकवासियों द्वारा मान्य भागामों उपलब्ध नहीं होतीं. और सम्पादकोंको एक ही प्रति परसे द्वारा अष्टांग योगका संकलन किया गया है और उसकी उस ग्रंथका सम्पादन कार्य करना पड़ता है इस ग्रंथके उपयोगिता एवं महत्ता बतलाई गई है। साथ ही, पातंसम्पादन सम्बन्धमें जिस शैलीको अपनाया गया है उसका जलिके योग सूत्रमें वर्णित अष्टांगका मागम परम्पराके सम्पादकोंने स्वयं दिग्दर्श करा दिया है। ग्रंथकी अन्य योगानुष्ठान अष्टांग योगका तुलनात्मक विवेचन भी किया प्राचीन प्रतियोंके अवलोकन एवं मिलानकी अब भी आव- है। इस तरह इस पुस्तकको उपयोगी बनानेका प्रयत्न श्यकता बनी हुई है। आशा है दूसरे जिनवाणी भक्त किया गया है। इस दिशामें लेखकका प्रयत्न प्रशंसनीय है।
SR No.538006
Book TitleAnekant 1944 Book 06 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1944
Total Pages436
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size28 MB
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