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________________ अनेकान्त [श्रावण, वीर निर्वाण सं०२४६ प्राचीन भारतकी धर्म-समवृत्ति शामनसे मालूम पड़ती है। १ ३. गुप्तवंशीय नरेश 'समुद्रगुप्त' । (ई० स० इस सन्दर्भ में सुसंगत एक बात और कहना है। इस भारत भूमि पर पीछेके सभी नरेश तथा अन्य ३३०-३७५) स्वतः वैष्णव होते हुए भी, अपने धर्मके समान बौद्ध तथा जैनधर्मियों पर भी विशेष भी अपने राज्यमें अथवा अन्यत्र सभी जगह विद्यमान अन्य सब धर्मोको तथा अन्य धर्मानु. प्रेम रखता था; और उसे बौद्धमती 'वसुबन्धु' नाम के व्यक्ति पर विशेष प्रामर था; तो भी वह अपना यायियोंको अपने धर्मकं समान, समानष्टिसे पुरस्कृत करते थे । इतना ही नहीं, किन्तु उन लोगों स्वधर्म छोड़ कर बौद्ध नहीं हुआ । सिंहल देशके के मठ-मंदिरादि बनवाकर दान देते थे, इस बात नरेश मेघवर्णन अपने देशसे इसके राज्यमें स्थित को दिखलाने वाले इतिहासमें बहुतसे प्रमाण हैं, बुद्धगयकी तरफ जानेवाले यात्रियोंके हितार्थ वहाँ उनमसे दृष्टान्तरूपमें कुछ यहाँ दिये जाते हैं : स्वयं एक विहार बनाने के लिये इससे अनुमति १. मौर्य सम्राट अशोक (ई. स. पूर्व चाही तो इमने उसे दिया, ऐमा मालम पड़ता है। २७४-२३६) बौद्धधर्म स्वीकार करके बौद्ध हुआ, १. चालुक्यान्वयका सत्याश्रय नामके दूसरे यह बात ऐतिहासिक लोग जानते हैं, नो भी उसने पुलिकेशीने अपने परमाप्त 'रविकीर्ति' नामक काश्मीर देशमे मनातन धर्मका देव मंदिर बनवाकर ('सत्याश्रयम्य परमात्मवता ....... .."रविजीर्णोद्धार करवाया था, यह बात 'कल्हण' की कीर्तिना' दिगम्बर शाग्याके (और बहुशः 'नंदि' 'राजतरंगिणी' से मालूम पड़ती है संघके ) जैनपंडितको स्वयं बनवाकर दिये हुये अथावहदशोकाख्यः सत्यसन्बो वसुन्धराम् ॥१, १०॥ जिनालयमें उम रविकीर्ति-द्वारा रचित और जीर्ण श्रीविजयेशस्य विनिवार्य सुधामयं । उत्कीर्ण शिलालेख ( ई० सन ६३४) जिनस्तुति. निष्कलषेणारममयः प्राकारो येन कारितः ॥ १, १०१ ॥ संबन्धी पद्योंसे प्रारंभ होने हुये भी, उस सभायां विजयेशस्य समीपेच विनिर्ममे । पुलिकेशीके अन्य सभी लेख विष्णु-स्तुति-सम्बशान्तावसादः प्रसादाक्शोकेश्वरसंहितौ ॥ १,१०६ ॥ न्धी पद्योंसे ही प्रारंभ होते हैं, इतना ही नहीं २. जैनधर्मानुयायी कलिंगदेशका राजा I Men and thought in ancient महामेघवाहन खारवेल (ई० स० पू० सु० १६९ ) India, pp. 157-159. सनातन, बौद्ध, जैनधर्मी साधुओंको समानदृष्टि । . इस समुद्रातका ध्वज गरुडध्वज था; इसके उपर दिये हुए नृपतुगके शासनमें उसने अपनेको 'गरुडतथा गुरुभक्तिसे सत्कार करता था तथा अपने लांछन' कहा है, यह बात ध्यानमें खाना चाहिये । राज्यमे अन्यान्य धर्मोकी भी बिना भेद भावके उदा.-(१) वह शक सं०१३३ (ई०स०६१०) रक्षा किया करता था,यह बात 'उदयांगरि के एक का एक ताम्र पत्रके प्रारंभमें वराहरूपी विष्णुकी स्तुति + यह उदयगिरि' मोडू देश ( Orissa ) के जयति जसवन्दश्यामनीलोत्पलमः । 'कट' (Cuttack)मगरसे मील दूर पर है।
SR No.538003
Book TitleAnekant 1940 Book 03 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1940
Total Pages826
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size80 MB
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