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________________ भगवान् ऋषभदेव के अमर स्मारक ( पं० हीरालाल जैन, सिद्धान्तशास्त्री ) जैन मान्यता के अनुसार भ० • ऋषभदेव इस युगके आदि तीर्थंकर थे । उन्होंने ही यहाँ पर सर्वप्रथम लोगोंको जीवन-निर्वाहका मार्ग बतलाया, उन्होंने ही स्वयं दीक्षित होकर साधु-मार्गका आदर्श उपस्थित किया और केवलज्ञान प्राप्त कर उन्होंने ही सर्वप्रथम संसारको धर्मका उपदेश दिया । भ० ऋषभदेवने लिपिविद्या और अंकविद्याका लिखना पढ़ना सिखलाया, ग्राम-नगरादिकी रचना की और लोगोंको विभिन्न प्रकारकी शिक्षा देकर वर्णोंकी स्थापना की । आज भारत में जो प्राचीन संस्कृति पाई जाती है, उसके मूलकी छानबीन करने पर पता चलता है कि उस पर भ० ऋषभदेव के द्वारा प्रचलित व्यवस्थाओंकी कितनी ही अमिट छाप आज भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है और अक्षय तृतीया, अक्षयवट तथा शिवरात्रि जैसे पर्व तो आज भी भगवानके अन्तिम तीनों कल्याणोंके अमर स्मारक के रूपमें उनके ऐतिहासिक महापुरुष होनेका स्वयं उद्घोष कर रहे हैं। इस लेखमें संक्षेपरूपसे भ० ऋषभदेवके इन्हीं अमर स्मारकों पर प्रकाश डाला जायगा । भारतवर्ष भ० ऋषभदेवके ज्येष्ठ पुत्र आदि चक्रवर्ती सम्राट् भरत सर्वप्रथम इस षट् खंड भूभाग के स्वामी बने और तभोसे इसका नाम 'भरतक्षेत्र' या 'भारतवर्ष' प्रसिद्ध हुआ। इस कथन की पुष्टि जैन-शास्त्रोंसे तो होती ही है, किन्तु हिन्दुओंके अनेक पुराणों में भी इसका स्पष्ट उल्लेख है । उनमेंसे २-१ प्रमाण यहाँ दिये जाते हैं: - नोस्तु ऋषभोऽभूत् सुतो द्विजः । ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताद्वरः ||३६|| हिमा दक्षिणं वर्ष भरताय पिता ददौ । तस्मात्तु भारतं वर्षे तस्य नाम्ना महात्मनः ॥ ४१ ॥ —( मार्कण्डेयपुराण अ० ५० ) अर्थात् - नाभिराजके पुत्र ऋषभदेव हुए और Jain Education International ऋषभदेवके भरत । भरत अपने सौ भाइयोंमें सबसे ज्येष्ठ थे । ऋषभदेवने हिमालयके दक्षिणका क्षेत्र भरत के लिये दिया और इस कारण उस महात्मा के नामसे इस क्षेत्रका नाम 'भारतवर्ष' पड़ा । यही बात विष्णुपुराण में भी कही गई है:नाभेः पुत्रश्च ऋषभः ऋषभाद् भरतोऽभवत् । तस्य नाम्ना विदं वर्ष भारतं चेति कीर्त्यते ॥ ५७॥ - (विष्णुपुराण, द्वितीयांश अ० १ ) इस प्रकार उपयुक्त उल्लेखोंसे जहां भरतके नामसे भरतके पिता होने के कारण भ० ऋषभदेवकी ऐतिहाइस क्षेत्रका नाम भारतवर्ष' सिद्ध होता है, वहां सिकता और प्राचीनता भी स्वतः सिद्ध हो जाती है । इक्ष्वाकुवंश 'जैन मान्यता के अनुसार भ० ऋषभदेवके जन्म से पूर्व यहां पर भोगभूमि थी और यहां के निवासी कल्पनिर्वाह करते थे। जब ऋषभदेवका जन्म हुआ, तब वृक्षोंसे प्रदत्त भोग-उपभोगकी सामग्री से अपना जीवन वह व्यवस्था समाप्त हो रही थी और कर्मभूमिकी रचना प्रारम्भ हो रही थी । भोगभूमिके समाप्त होते प्यास से पीड़ित हो उठे । वे ' त्राहि-त्राहि करते हुए कल्पवृक्ष और यहां निवासी भूखऋषभदेवके पास पहुंचे । लोगोंने अपनी करुण कहानी उनके सामने रखी। भगवान उनके कष्ट सुनकर द्रवित हो उठे और उन्होंने सर्वप्रथम अनेक दिनोंसे भूखी-प्यासी प्रजाको अपने आप उगे हुए इक्षुओं (गन्नों ) के रस-पान-द्वारा अपनी भूख-प्यास शान्त करने का उपाय बतलाया और इसी कारण लोग आपको 'इवाकु' कहने लगे । 'इक्षु इति शब्दं अकतीति, अथवा इक्षुमाकरोतीति इक्ष्वाकु: ।' अर्थात् भूखी-प्यासी प्रजाको 'इक्षु' ऐसा शब्द कहने के कारण भगवान् 'इक्ष्वाकु' कहलाये । सोमवंश, सूर्यवंश आदि जितने भी वंश हैं, उनमें 'इक्ष्वाकु वंश ही आद्य माना जाता है । For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.527330
Book TitleAnekant 1954 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherJugalkishor Mukhtar
Publication Year1954
Total Pages32
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size9 MB
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