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________________ अनेकान्त - [ वर्ष जावइया वयणवहा तावइया चेव होंति णयवाया। जावइया णयवाया तावइया चेव परसमया ॥४७॥ जं काविलं दरिसणं एवं दवट्ठियस्स वत्तव्वं । सुद्धोअण-तणअस्स उ परिसुद्धो पज्जवविअप्पों ॥४८॥ दोहि विणएहि णीयं सत्थमुलूएण तह वि मिच्छत्त । जं सविसअप्पहाणतणेण अएणोएणणिरवेक्खा ॥४९॥ इनके अनन्तर निम्न दो गाथाओंमें यह प्रतिपादन किया है कि 'सांख्योंके सद्वादपक्षमें बौद्ध और वैशेषिक जन जो दोष देते हैं तथा बौद्धों और वैशेषिकोंके असंवादपक्षमें सांख्य जन जो दोष देते हैं वे सब सत्य हैं- सर्वथा एकान्तवादमें वैसे दोष आते ही हैं। ये दोनों सद्वाद और असद्वाद दृष्टियाँ यदि एक दूसरेकी अपेक्षा रखते हुए संयोजित हो जायेंसमन्वयपूर्वक अनेकान्तदृष्टिमें परिणत हो जायँ तो सर्वोत्तम सम्यग्दशन बनता है; क्योंकि ये सतू-असत्रूप दोनों दृष्टियाँ अलग अलग संसारके दुःखसे छुटकारा दिलानेमें समर्थ नहीं हैं-दोनोंके सापेक्ष संयोगसे ही एक-दूसरेकी कमी दूर होकर संसारके दुःखोंसे शान्ति मिल सकती है: जे संतवाय-दोसे सक्कोलूया भणंति संखाणं । संखा य असव्वाए तेसिं सब्वे वि ते सच्चा ॥५०॥. ते उ भयणोवणीया सम्ममणमणत्तर होति । जं भव-दुक्ख-विमोक्खं दो वि ण पूरेंति पाडिक ॥५१॥ इस सब कथनपरसे मिथ्यादर्शनों और सम्यग्दर्शनका तत्त्व सहज ही समझमें आजाता है और यह मालूम हो जाता है कि कैसे सभी मिथ्यादर्शन मिलकर सम्यग्दशनके रूपमें परिणत हो जाते हैं। मिथ्यादर्शन अथवा जैनेतरदर्शन जब तक अपने अपने वक्तव्यके प्रतिपादनमें एकान्तताको अपनाकर परविरोधका लक्ष्य रखते हैं तब तक वे सम्यग्दर्शनमें परिणत नहीं होते, और जब विरोधका लक्ष्य छोड़कर पारस्परिक अपेक्षाको लिये हुए समन्वयकी दृष्टिको अपनाते हैं तभी सम्यग्दर्शनमें परिणत हो जाते हैं और जैनदशन कहलानेके योग्य होते हैं। जैनदर्शन अपने स्याद्वादन्याय-द्वारा समन्वयकी दृष्टिको लिये हुए है-समन्वय ही उसका नियामक तत्त्व है, न कि विरोध-और इसलिये सभी मिथ्यादर्शन अपने अपने विरोधको भुलाकर उसमें समा जाते हैं। इसीसे ग्रन्थकी अन्तिम गाथामें जिनवचनरूप जिनशासन अथवा जैनदर्शनकी मङ्गलकामना करते हुए उसे 'मिथ्यादर्शनोंका समूहमय' बतलाया है। वह गाथा इस प्रकार है: भई मिच्छादसण-समूहमइयस्स अमयसारस्स ॥ जिणवयणस्स भगवत्रो संविग्गसुहाहिगम्मस्म ॥७॥ इसमें जैनदर्शन (शासन)के तीन खास विशेषणोंका उल्लेख किया गया है-पहला विशेषण मिथ्यादर्शनसमूहमय, दूसरा अमृतसार और तीसरा संविग्नसुखाधिगम्य है । मिथ्यादर्शनोंका समूह होते हुए भी वह मिथ्यात्वरूप नहीं हैं, यही उसकी सर्वोपरि विशेषता है और यह विशेषता उसके सापेक्ष नयवादमें सन्निहित है-सापेक्ष नय मिथ्या नहीं होते. निरपेक्ष नय ही मिथ्या होते हैं । जब सारी विरोधी दृष्टियाँ एकत्र स्थान पाती हैं तब फिर १ मिथ्यासमूहो मिथ्या चेन्न मिथ्यकान्तताऽस्ति नः । निरपेक्षा नया मिथ्या सापेक्षा वस्तु तेऽर्थकृत् ॥१८ www.jainelibrary.org
SR No.527261
Book TitleAnekant 1948 11 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherJugalkishor Mukhtar
Publication Year1948
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size3 MB
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