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परन्तु उनमें हाथीके पैरतले दबवाकर मरवानेकी घटनाका बहुत प्रचार है । यह घटना कोरी कल्पना ही नहीं है, किन्तु उसमें उनकी मृत्युका रहस्य निहित है । पहिले मेरी यह धारणा थी कि इस प्रकारकी अकल्पित घटना पं० टोडरमल्लजी जैसे महान् विद्वानके साथ नहीं घट सकती; परन्तु बहुत कुछ अन्वेषण तथा उसपर काफी विचार करने के बाद अब मेरी यह दृढ़ धारणा होगई है कि उपरोक्त किम्बदन्ती असत्य नहीं है किन्तु वह किसी तथ्यको लिये हुये अवश्य है । जब हम उसपर गहरा विचार करते हैं और पं० जीके व्यक्तित्व तथा उनकी सीधी सादी भद्र परिणतिकी ओर भी ध्यान देते हैं; जो स्वप्न में भी कभी पीड़ा देने का भाव नहीं रखते थे, तब उनके प्रति विद्वेषवश अथवा उनके प्रभाव तथा व्यक्तित्व के साथ घोर ईर्षा रखनेवाले जैनेतर व्यक्तिके द्वारा साम्प्रदायिक व्यामोहवश सुझाये गये अकल्पित एवं अशक्य अपराधके द्वारा अन्धश्रद्धावश बिना किसी निर्णय यदि राजाका कोप सहसा उमड़ पड़ा हो, और राजाने पंडितजीके लिये बिना किसी अपराधके भी उक्त प्रकार से 'मृत्युदण्ड' का फतवा दे दिया हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है जब हम उस समयकी भारतीय रियासतीय परिस्थितियों पर ध्यान देते हैं; और उनके अन्धश्रद्धावश किये गये अन्यायअत्याचारोंकी झांकीका अवलोकन करते हैं, तब
अनेकान्त
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[ वर्षह
उसमें आश्चर्यको कोई स्थान नहीं रहता। यही कारण है कि उस समयके विद्वानोंने राज्यके भय से उनकी मृत्यु आदिके सम्बन्धमें स्पष्ट कुछभी नहीं लिखा; क्योंकि रियासतों में खासतौर पर मृत्युभय और धनादिके अपहरणकी सहस्रों घटनायें घटती रहती हैं, और उनसे प्रजा में घोर आतंक बना रहता है; किन्तु आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं और अब प्रायः इस प्रकारको घटनायें कहीं सुननेमें नहीं श्राती ।
अब प्रश्न केवल समयका रह जाता है कि उक्त घटना कब घटी ? यद्यपि इस सम्बन्धमें इतनांही कहा जा सकता है कि सं० १८२१ और सं० १८०४ के मध्य में माधवसिंहजी प्रथमके राज्य काल में किसी समय घटी है, परन्तु उसकी अधिकांश सम्भावना सं० १८२४ में जान पड़ती है। चूंकि पं० देवीदास जोकी जयपुर से बसवा जाने, और उससे वापिस लौटनेपर पुनः पं० टोडरमल्लजी नहीं मिले, तब उन्होंने उनके लघुपुत्र पण्डित गुमानीरामजी के पासही तत्त्वचर्चा सुनकर कुछज्ञान प्राप्त किया, यह उल्लेख सं० १८२४ के बाद का है। और उसके अनन्तर देवीदास जी जयपुर में सं० १८३८ तक रहे हैं । वीर सेवामन्दिर
६-१-१६४८
सरसावा
समन्तभद्रके भाष्यकी समस्या विचारकके लिये एक खास विचारणीय वस्तु बनी हुई है । अभीतक मैं स्वयं इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि समन्तभद्र के द्वारा रचा गया जो भाष्य माना जाता है और जिसे तत्त्वार्थभाष्य अथवा गन्धहस्ति महाभाष्य कहा जाता है वह एक कल्पनामात्र है और उस कल्पना के जनक अभयचन्द्र सूरि हैं । परन्तु मैंने अपनी खोज को बन्द
समन्तभद्र-भाष्य
नहीं किया और जब समन्तभद्र तथा उनके ग्रथों के उल्लेखको लिये हुये कोई नया ग्रन्थ दृष्टि में आता है तोमैं बड़ी उत्सुकतासे उसे देखने में प्रवृत्त होता हूं । और यह जाननेको उत्सुक रहता हूं कि इसमें समन्तभद्रके तथाकथित भाष्यका उल्लेख तो नहीं है ? चुनांचे अभी हाल में 'लक्षणावली' में जिन ग्रन्थों के लक्षणोंका संकलन नहीं हुआ था उनके लक्षण
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