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________________ किरण १ न्याय की उपयोगिता भावको अपनी बोलचालकी भाषा और शब्दोंमें न्यायशाला के शिक्षक को अपने दिमाग पर मुख्यतः ही प्रकट करना चाहिये। इससे जहां छात्रोंको जोर देना चाहिये। इतना प्रकृतोपयोगी प्रसङ्गानुन्याय पढ़नेमें अरुचि नहीं होगी वहां शिक्षकको सार कह कर अब मूल प्रश्न पर प्रकाश डाला जाता एक फायदा यह होगा कि वह स्वतन्त्र चिन्तक हैबनेगा- वह टीकादि ग्रन्थों में हुई भूलों के १-हम पहिले कह आये हैं कि हरेक व्यक्तिकी दुहराने एवं अनुसरण करने से बच जाता है। बुद्धि स्वभावत: कुछ न कुछ तर्कशील रहती है। पर अन्यथा वह गतानुगतिक बना रहेगा। उदाहरण न्यायशास्त्रके अध्ययनसे उस तकमें विकास स्वरूप न्यायदीपिकामें असाधारण धर्मको लक्षण होता है, बुद्धि परिमार्जित होती है, प्रश्न करने का लक्षण मानने वालों के लिये अव्याप्ति, और उसे जमा कर उपस्थित करनेका बुद्धिमें अतिव्याप्ति, असम्भव यह तीन दोष दिये गये हैं। माददा आता है। बिना तबकी बुद्धि कभी कभी इसकी हिन्दी टीकामें टीकाकार पं० खूबचन्दजी से ऊट पटांग- जीको स्पर्श न करने वाले प्रश्न कर असम्भव दोष का खुलासा करने में एक भूल हो गई बैठती है, जिससे व्यक्ति हास्यका पात्र बनता है। है। वहां कहा गया है २- न्याय ग्रन्थोंका पढ़ना व्यवहार कुशलता 'लक्ष्य और लक्षण ये दोनों एक ही अधिकरण के लिये भी उपयोगी है। उससे हमें. यह मालूम में रहते हैं, ऐसा नियम है। यदि ऐसा न मानोगे होजाता है कि दुनियामें भिन्न भिन्न विचारोंके तो घट का लक्षण पट भी मानना पड़ेगा परन्तु लोग हमेशासे रहे हैं और रहेंगे। यदि हमारे तु विचार ठीक और सत्य हैं और दूसरेके विचार प्रवादी के माने हुए लक्षण के अनुसार लक्ष्य तथा ठीक एवं सत्य नहीं हैं तो दर्शनशास्त्र हमें दिशा लक्षण का रहना एक ही अधिकरण में नहीं बन दिखाता है कि हम सत्यके साथ सहिष्णा भी बनें सकता। क्योंकि उसके मतानुसार लक्षण लक्ष्य और अपनेसे विरोधी विचार वालों को अपने में रहता है और लक्ष्य अपने अवयवों में रहता है। तर्कों द्वारा ही सत्यकी ओर लानेका प्रयत्न करें, जैसे पृथ्वी का लक्षण गन्ध है वह गन्ध पृथ्वी में । | जोर जबरदस्ती से नहीं। जैन दर्शन सत्यके साथ रहता है और पृथ्वी अपने अवयवों में रहती है। सहिष्ण है इसीलिये वह और उसका सम्प्रदाय इसी प्रकार सभी उदाहरणों में लक्ष्य तथा लक्षण में भिन्नाधिकरणता ही सिद्ध होती है। कहीं भी भारत में टिका चला आरहा है अन्यथा बौद्ध श्रादि एकाधिकरणता नहीं बनती। इसलिये इस दर्शनाकी तरह उसका टिकना अशक्य था। अन्धलक्षण के लक्षण में असम्भव दोप आता है। श्रद्धाको हटाने, वस्तुस्थितिको समझने और विभिन्न विचारोंका समन्वय करने के लिये न्याय न्यायदीपिकामें उक्त लक्षण के लक्षण में एवं दार्शनिक ग्रन्थोंका पढ़ना, मनन करना, चिन्तन जो असम्भव दोष कहा गया है वह शाब्द करना जरूरी है। न्याय ग्रन्थोंमें जो आलोचना सामानाधिकरण्य के अभाव को लेकर है, आर्थ पाई जाती है उसका उद्देश्य केवल इतना ही है सामानाधिकरण्य के अभाव को लेकर नहीं। इस सम्बन्ध में पं० वंशीधर जी व्याकरणाचायें कई वर्षे १ मैंने भी स्पष्ट किया है देखो न्यायदीपिका पृ० १० पूर्वस्पष्ट कर चुके हैं१ । परन्तु न्यायदीपिका के अनेक प्रस्ता०], पृ० १४१ [हिन्दी टीका] तथा परि० नं०७ शिक्षक अभी भी उक्त भूल को दुहराते हैं। अत: पृ० २३८ । Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.527251
Book TitleAnekant 1948 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherJugalkishor Mukhtar
Publication Year1948
Total Pages48
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size12 MB
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