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________________ किरण ६-७१ भगवान महावीर और उनका सन्देश २३६ किन्तु विज्ञान जैसी पवित्र वस्तुका दुरुपयोग करने वाले सरह बुद्धिने निरे पाशविक बलपर तह पाई थी, उसी रक्तपिपासु नररूपी दानवोंको क्या कहें १ वे दुष्ट दानव तरह अब त्यागके बलबूतेपर लोभ और अहंकारका दमन अवश्य अपनी काली करतूतोंकी सजा पावेंगे, क्योंकि उन्हींके करना होगा। प्रानो मानव ! अामाको कारागारसे निकालने में निर्मित हथियार उन्हींके विरुद्ध उपयोगमें लाए जावेंगे।" मदद दो, मानवके प्रति श्रद्धा, त्याग और मानवताको प्रगट गुरुदेवकी भविष्यवाणी सच निकली। जर्ममीने भयंकर करो" आदि। शस्त्र तथा अस्त्रोंसे सुसज्जित होकर सारे धरातलको पाश्चर्य “यही है इबादत, यही दीनो ईमों। चकित कर दिया था, और ऐसा प्रतीत होरहा था कि इन कि काम आये दुनियाँ में इनसा के इनौं।" नतनतासे परिपूर्ण अविष्कारों के बलपर सारे संसारपर उसकी ऐतिहासिक दृष्टिले धर्मका जन्म विजय-पताका फहराने लगेगी। किन्तु आज उसी शस्त्रास और उसी रणनीतिने जिसका वह निर्माता था उसको तहस __ ऐतिहासिक दृष्टिसे यदि छानबीन की जाए तो इस नहस करके ही दम लिया, ऐसा स्पष्ट हो गया है। ख्यात बातका पता चलता है कि सदियों पहिले इस एनगर्भा नामा डाक्टर इकबालने भी इसी मतको प्रदर्शित किया है:- भारत-भूमिमें नैतिकताकी आवाज गूंजती थी, मनुष्यके "तुम्हारी तहजीब अपने खंजरसे, श्रापही खुदकशी करेगी. प्रति मानवताका व्यवहार करना ही धर्म समझा जाता था। जो शाख्ने नाजुकपे आशियाना बना वो नापायदार छोगा।" नैतिक जिम्मेदारीके अनुसार ही सांसारिक कार्य चलते थे। सच तो यह है कि पाश्रिमात्य सभ्यता तथा संस्कृति __ मानव प्राणी जब दूसरोंको अपने प्रति सन्यवहारसे पेश देखने में अत्यन्त सुन्दर प्रतीत होती है। इसका रूप तथा पाते देखता तो वह भी स्वाभाविक तौरपर अनायास ही शृंगार आँखों में चकाचौंध पैदा करता है। यह एक नशा है दूसरेके प्रति प्रेम प्रकट करता, उसके न्याय्य अधिकारों के किन्तु इसका परिणाम अत्यन्त भयावह तथा आत्मनाशका संरक्षण व संवर्धनमें लग जाका अर्थात् द्वेष और मत्सर कारण है। यह भ्रान्त धारणा समस्त संसारका सर्वनाश प्रतियोगिता तथा मुकाबलेके बदले सरलता और प्रेम तथा करेगी, अतएव किसी तरह भी इसे पूर्वीय लिबास नहीं पारस्परिक सहायताके मार्गपर चलने लगता। किन्तु संसारकी पहिनाया जा सकेगा। खुद पश्चिममें श्राज अस्त्र तथा शस्त्रों गति सदा एकसी नहीं रही। शनैः शनैः नैतिक जिम्मेदारीको की मनकार तथा अनठे व रोचक वैज्ञानिक प्राविष्कारों में लोग भूलने लगे। साँसारिक कार्यों में बाधा उपस्थित होने जीवनका सुमधुर सङ्गीत विलीन हो चुका है। मत्सर, लगी। चालाक और स्वार्थी लोग दूसरोंकी नैतिकतासे प्रतियोगिता तथा प्राण-घातक आर्थिक मुकाबलेकी काली फायदा उठाने लगे और समाजके नेताओंको व्यवहारके छायामें विकासका राजमार्ग भुला दिया है, और उन्हें अपनी लोप होने और अशान्तिका भयानक चित्र दिखाई देने खामखथालीने कायल कर दिया है तथा यह समझने लग लगा। अतएव समाजको अनीतिके गहरे कूपमें गिरनेसे गये हैं कि वे गुमराह हैं और शान्ति तथा कल्याणकी बचानेके लिए, सामाजिक शासनको सुसंगठित करनेके लिए उनकी कल्पना एक ऐसा स्वप्न है जो कभी भी सत्यकी नैतिक नियमोंको ही धार्मिक रूपमें परिणत करनेकी भावसृष्टिमें परिणत नहीं किया जा सकता। श्यकता प्रतीत हुई । इन्हीं नैतिक नियमोंको संकलित, स्व. गुरुदेव इस आपत्तिजनक परिस्थितिसे बचनेके परिवधित और संशोधित करके धर्मका मौलिक रूप दिया लिए एकमात्र उपाय बतलाते रहे। उन्होंने कहीं लिखा गया। पुण्य और पापकी परिभाषा इसीका परिणाम है। है:-"अब समयने पलटा खाया है, अतएव पाशविक तथा जब नैतिक बन्धनोंका भय जाता रहा तो प्राकृतिक तथा जड़ शनि जब असफल रही है तो अन्य शक्रिकी खोज सामाजिक नियमोंका उल्लंघन धार्मिक दृष्टिसे अक्षम्य करार लगाना अवश्यम्भावि हो जाता है। दूसरोंको कष्ट पहुंचानेसे पाया! नैतिक जिम्मेदारीकी जगह अब धार्मिक जिम्मेदारी अब काम नहीं चलेगा बल्कि अब स्वयं कष्टको सहन करते समाजका अाधार व विश्व-कल्याणका प्राण बन गई। हुए त्याग भावनाको अपनाना होगा। पिछले युगोंमें जिस मानवके कष्टोंका अन्त करनेके लिए नैतिक सिद्धान्त-धार्मिक Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.527238
Book TitleAnekant 1946 11 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherJugalkishor Mukhtar
Publication Year1946
Total Pages80
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size3 MB
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