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३, किरण १२]
पंडितप्रवर आशाधर
गये हैं, उनसे इस कल्पनाको बहुत कुछ पुष्टि मिलती "व्याघ्र वालवंशस रोज हंसः काव्यामृतौघरसपानसुतृप्तगात्रः
सल्लक्षणस्य तनयो नयविश्वचतुराशाध
है । और फिर यह अर्हदास नाम भी विशेषण : जैसा ही मालूम होता है । सम्भव है उनका वास्तविक नाम कुछ और ही रहा हो । यह नाम तो एक तरह की भावुकता और विनयशीलता ही प्रकट करता है ।
इस सम्बन्धमें एक बात और भी नोट करने लायक है कि अर्हद्दासजीके प्रन्थोंका प्रचार प्रायः कर्णाटक प्रान्त में ही रहा है जहां कि वे चतुर्विंश तिप्रबन्धकी कथा के अनुसार सुमार्ग से पतित होकर रहने लगे थे । सत्पथपर पुन: लौटने पर उनका वहीं रह जाना सम्भव भी जंचता है ।
इतना सब लिख चुकने के बाद अब हम पं० आशाधर जी के अन्तिम ग्रन्थ अनगारधर्मामृत टीकाकी अन्त्य प्रशस्ति उद्धृत करके उसका भावार्थ भी लिख देते हैं जिसके आधार पर पूर्वोक्त सब बातें कही गई हैं । यह उनकी मुख्य प्रशस्ति है, अन्य ग्रंथोंकी प्रशस्तियाँ इसीमें कुछ पद्य कम ज्यादा करके बनी हैं । उन न्यूनाधिक पद्योंको भी हमने टिप्पणी में दे दिया है और आगे चलकर उनका भी अभिप्राय लिख दिया है ।
मुख्य प्रशस्ति
श्रीमानस्ति सपादलक्षविषयः शाकम्भरीभूषणस्तत्र श्रीरतिधाम मण्डलकरं नामास्ति दुर्गं महत् । श्रीरम्यामुपादि तत्र विमलब्याघ्र रवालान्वयाच्छ्रीसल्लक्षणतो जिनेन्द्रसमयश्रद्धालुराशाधरः ॥१॥ सरस्वत्यामिवात्मानं सरस्वस्यामजीजनद् । यः पुत्रं छाहडं गुण्यं रंजितार्जुनभूपतिम् ॥२॥
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विजयतां कलिकालिदासः " ॥ ३ ॥ इस्युदय सेन मुनिना कविसुहृदा योऽभिनन्दितः प्रीया । "प्रज्ञापुंजोऽसी" ति च योऽभिहितो
मदन कीर्तियतिपतिना || lif म्लेच्छ्रेशेन + सपादलक्षविषये व्याप्ते सुवृत्तपतित्रासाद्विन्ध्य नरेन्द्र दोः परिमलस्फूर्जस्त्रिवगौजसि । प्राप्तो मालवमण्डले बहुपरीवारः पुरीमावसन् यो धारामपठज्जिनप्रमितिवाक्शास्त्रे महावीरतः ॥en "श्राशावरत्वं 'मयि विद्धि सिद्धं निसर्गसौदर्यमजर्यमार्य । सरस्वतीपुत्रतया यदेतदर्थे परं वाण्यमयं प्रपञ्चः " ॥६॥ इत्युपश्लोकितो विद्वद्बिह्नणेन कवीशिना । श्रीविन्ध्यभूपतिमहा सान्धिविग्रहिकेण यः ॥ ७ ॥ श्रीमदर्जुन भुपालराज्ये श्रावकसं कुले । जिनधर्मोदयार्थ यो नलकच्छपुरेऽवसत् ॥ ८ ॥ यो द्राव्याकरणाधिपारमनयच्छुश्रूषमाणान कान्, षट्तक परमास्त्रमाध्य न यतः प्रत्यर्थिनः केऽचिपन् ।
+ मूलाराधना टीका ( शोलापुर ) जिस प्रति परसे प्रकाशित हुई है, उसमें प्रशस्तिके ये चार ही पद्य मिले हैं और सम्पादक पं० जिनदास शास्त्रीने प्रशस्तिको अपूर्ण लिखा है । शायद आगेका पत्र गायब है ।
त्रिषष्टिस्मृतिशास्त्र की प्रशस्ति में प्रारम्भके दो पद्यों के बाद 'व्याघ्रेरवाल' आदि पद्य न होकर 'म्लेच्छेशेन' आदि पाँचवाँ पद्य है । उसके बाद 'श्रीमदर्जुन भूपाल' आदि आठवाँ और फर 'योद्राग्व्याकरणाब्धि' आदि नवाँ पद्य दिया है।
+ म्लेच्छेशेन साहिबुदीन तुरुष्कराजेन । -भव्यकुमुदचन्द्रिका टीका |