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वर्ष ३, किरण १]
प्रोजगदीशचन्द्र और उनकी समीक्षा
हो सकता है कि अपनी जिम मान्यता अथवा धारणाको प्रो० साहब सम्पादकको विचारक नहीं मानते १ या उन श्राप सहज ही दूसरे विद्वानोंके गले उतारना चाहते थे विद्वानोंमें परिगणित नहीं करते जिन्हें आपने अपने लेख उसमें उक्त 'विचारणा के कारण स्पष्ट बाधाका उप- पर विचार करने के लिये आमन्त्रित किया है १ अथवा स्थित होना आपको अँच गया हो और यही बात उसे अपने लेखका वह पाठक तक भी नहीं समझते आपकी अप्रसन्नताका कारण बन गई हो । अस्तु, जिमके विचाराऽधिकारको अपने लेखके उक्त आपके वे अप्रसन्नता-सूचक वाक्य, जिन्हें लेखके साथ वाक्यमें स्वयं स्वीकार किया है ? यदि ऐसा कुछ संगत अथवा उसका कोई विषय न होने पर मी आपको भी नहीं है तो फिर 'सम्पादकीय विचारणा' पर . अपनी चित्तवृत्ति के न रोक सकनेके कारण देने पड़े हैं उक्त आपत्ति और अप्रसन्नता कैसी ? अथवा
और साथ ही यह लिखना पड़ा है कि “यह इस लेखका सम्पादकके विचाराधिकार पर इस प्रकारका नियन्त्रण विषय नहीं है", इस प्रकार हैं:
कैसा कि वह किसीके लेख पर विचार न करके स्वतन्त्र ___ "शायद पं० जुगलकिशोरजीको यह बात न अँची, लेख लिखा करे ? और यदि इनमेंसे कोई बात प्रो०
और उन्होंने मेरे लेखके अन्त में एक लम्बी-चौड़ी टिप्पणी साहबके ध्यान में रही है तो कहना होगा कि आपके लगा दी । हमारी समझसे इस तरह के रिसर्च-सम्बन्धी उस लेखका ध्येय स्वतन्त्र विचार नहीं था-विचारका
स्पद विषय हैं, उन पर पाठकोंको कुछ समय मात्र अाडम्बर अथवा प्रदर्शन था। और इसलिये तब के लिये स्वतन्त्ररूपसे विचार करने देना चाहिये । आपकी अप्रसन्नताका कारण वही हो सकता है जिसकी सम्पादकको यदि कुछ लिखना ही इष्ट हो तो वह स्वतंत्र सम्भावनाको ऊपर कल्पना कीगई है । ऐसे कारणका लेख के रूपमें भी लिखा जासकता है । साथ ही, यह होना निःसन्देह एक विचारक तथा विचारके लिये
आवश्यकता नहीं कि लेखक सम्पादकके विचारोंसे दूमरे विद्वानोंको आमंत्रित करने वालेके लिए बड़ी सर्वथा सहमत ही हो।"
ही लजाकी बात होगी । बाकी यह बात कब किसने इन वाक्यों परसे जहाँ यह स्पष्ट है कि प्रो० साहब आवश्यक बतलाई है कि "लेखक सम्पादकके विचारोंसे को उक्त 'सम्पादकीय विचारणा' नागवार (अरुचिकर) सर्वथा सहमत ही हो" १ जिसके निषेधकी प्रो० साहबको मालुम हुई है वहाँ यह स्पष्ट नहीं है कि उससे पाठकोंके ज़रूरत पड़ी है, सो कुछ भी मालूम नहीं हो सका । स्वतन्त्ररूपसे विचार करने में कौनसी बाधा उपस्थित हो यदि ऐसी कोई बात अावश्यक हो तो सम्पादक ऐसे गई है–उसने तो पाठकोंके विचारक्षेत्रको बढ़ाया है लेखको छापे ही क्यों ? और क्यों टीका-टिप्पणी अथवा
और उनके सामने समुचित विचारमें सहायक और अधिक नोट लगानेका परिश्रम उठाए ? परन्तु बास ऐसी नहीं सामग्री रक्खी है । क्या समुचितविचारमें सहायक अधिक है । वास्तवमें जब किसी सावधान सम्पादकको यह बात सामग्रीका जुटाया जाना अथवा जानकार विद्वानोंके जंच जाती है कि लेखका अमुक अंश भ्रममूलक है द्वारा विचारका जल्दी प्रारम्भ कर दिया जाना रिसर्च और वह जनतामें किसी भारी भ्रान्ति अथवा ग़लतसम्बन्धी अथवा किसी भी विवादास्पद विषय के विचारमें फ़हमीको फैलाने वाला है तो वह अपने पाठकोंको कोई बाधा उत्पन्न करताहै ? कदापि नहीं । तब क्या उससे सावधान कर देना अपना कर्तव्य समझता है;