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अनेकान्त
[भाद्रपद, वीर निर्वाण सं०२४५६
इस काव्यके प्रथम भागमें ही विष्णु स्तुति अपनी कवितामें जगह जगह पर क्यों नहीं बखेर स्पष्ट रहते हुए भी उस तरफ ध्यान नहीं देते हुए, दिया । श्रीमान् पाठक महाशयका इसके 1९० और III नृपतुंग राजा होनेसे कवि नहीं था यह बात १८ इन दो पद्योंके आधारसे यह कहना कि नहीं; क्योंकि भारतवर्षमें शासन करने वाले बहुत"Two verses which praise Jina,reflect से नरेश स्वयं कवि थे; यदि वैसा न हो तो the religious opinions of the author" 'राजशेखर'की (ई०स०करीब ८८०-९२८के बीचमें) (क० मा० उ० पृ० ७) ठीक नहीं है, क्योंकि 'काव्यमीमांसा' के *-"राजा कविः कविसमानं इन दोनोंमें I ६० को इस कविकी स्वतन्त्र रचना विदधीत । राजनि कवौ सर्वो लोकः कविः स्यात् ॥" कहनेकेबदले 'व्यवहित दोष' निदर्शन करने के लिये इस वाक्यका वक्तव्य स्वप्नकी बातें नहीं होगा
और किसी काव्यसे लिया हुआ द्रष्टान्त मालूम क्या ? इस बात को और स्पष्ट करनेके लिये कुछ पड़ता है, III १८वाँ पद्य इनसे ही रचा गया कन्द उदाहरण दिये जाते हैं -(१) सोड्डल देवकी पद्य हुआ होगा । सकल धर्मोको समान दृष्टिसे ( ई० स० ११ वां शतक) 'उदयसुन्दरी कथा' में । सत्कार करने वाले इस कन्द पद्यकी रचना करनेसे "कवीन्द्रैश्च विक्रमादित्य श्री हर्ष-मुंज-भोजदेवादि ही वह जैन था यह कहना असंगतहै इसके सिवाय भूपालैः" लिखा है, (२ ) श्रीहर्षवर्द्धनने (ई० स० कोई भी कवि अपने इष्टदेवताकी स्तुति ग्रन्थारम्भमें ६०६.६४७ ) संस्कृतमें 'प्रियदर्शिका', 'रत्नावली' ही करता है, बीच में या अन्य जगह जगह पर नहीं - करता है । बहुशः I ७८ वां पद्य जैन धर्म-सम्बन्धी जैनियों में भी किसी प्रकारका धर्मभेद नहीं था पद्य होना चाहिये । इससे क्या ? कविके विचारमें इस बातकी मामतुंगाचार्य कृतपवित्र भक्तामरस्तोत्र' धर्मभेद है क्या ? जिस धर्ममें अच्छी बात हो उसे नामक जिनस्तुति ही साक्षी है:- . ग्रहण करना कविका धर्म नहीं है क्या ? अच्छी "स्वामव्ययं विभुमचित्यमसंख्यमायं । बात अपने धर्ममें हो तो अच्छी, अन्य धर्म में हो ब्रह्माणमीश्यरमनंतमनंगकेतुम ॥ तो अच्छी नहीं, यह भेद कवियोंमें है क्या ? इसके योगीश्वरं विदितयोगमनेकमेकं । सिवाय कविराज मार्गके I १०३-१०४ नं० के
ज्ञानस्वरूपममलं प्रवदन्ति सन्तः ॥ २४ ॥ पद्योंमें इसने ‘समयविरुद्ध' दोष सम्बन्धी प्रस्ताव में कपिल (सांख्य ), सुगत (बौद्ध), कणचर
, वुद्धस्त्वमेव विभुधाचितबुद्धिबोधात् । ( = कणाद,वैशेषिक ) लोकायतिक (नास्तिक )
त्वं शंकरोसि भुवनत्रयशंकरत्वात् ॥ इत्यादि मत-सम्बन्धी उद्गार उन उन मार्गभेदके धातासि धीर शिवमार्गविधेविधानाद् । अनगुण होने चाहिये। उन उन समयसूत्रोंके व्यक्तं त्वमेव भगवन् पुरुषोत्तमोसि" ॥ २५ ॥ विरुद्ध नहीं होने चाहियें, यह बात इसने नहीं कही * Gaekwad's Oriental Series, No. I P. 54. क्या ? ऐसे व्यक्तिने जिनस्तुति-सम्बन्धी पद्योंको Ibid. No. XI P. 150.