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________________ वर्ष ३, किरण ११] नृपतुंगका मत विचार ६४७ भक्त मालूम पड़ता है किन्तु जैनी था यह हुआ तो किसी जैनाचार्यके उपदेशसे ही होना मालूम नहीं पड़ता; वैसे ही उसी शासनके 'गरुढ़- चाहिये, इस विषयमें उसका उपदेश गुरु जिनसेन जाइन' 'कीर्तिनारायणो' 'महाविष्णुवराज्यम्बोल' था इस प्रकार कुछ लोगोंका विश्वास है । पर इत्यादिसे यह वैष्णव था, यह बात स्पष्ट मालूम जिनसेन-द्वारा नृपतुंग जैनी हुआ, यह बात पड़ती है । इसके अन्तिम वर्षके ( ई० सन् ८७७) 'गणितसारसंग्रह' में नहीं कही गई, अथवा जिनसोरब नं ८५, (E.C.Vol.Vill., pt.ll) शासन सेनके सिवाय अन्य जैनाचार्य के उपदेशसे नृपतुंग से भी, यह जैन था इस सम्बन्धमें कोई प्रमाण जैनी हुआ यह बात नहीं कही गई; और जन्मतः नहीं मिलता। पर ई० स० ८७७ के पश्चात् नप- जैनी नहीं रहे नरेशको जैनी कहा गया। प्रशस्ति तुंग जैन क्यों नहीं बन सकता ? यह आक्षेप हो के अनेक पद्योंमें वह किसके उपदेशसे जैनधर्मी सकता है। पर यह बात हो भी सकती है और हुआ इस सम्बन्धमें भी एक दो बात लिखना उस नहीं भी; क्योंकि ई० स० ८७७ में नृपतुंगका देहा- ग्रन्थकर्ताका कर्तव्य था। वसान हुआ हो, या राज्यकारसे निवृत होकर अतएव इस गणित ग्रंथकी प्रशस्तिमें कहा उसने वानप्रस्थाश्रमका ग्रहण किया हो, इसका हुआ वक्तव्य उस आचार्य-द्वारा स्वतः जाना हुआ निष्कर्ष अब तक नहीं हुआ, अनिश्चित् ऐतिहा- सत्य नहीं किन्तु कर्णपरंपरासे सुनी हुई बातको सिक घटना परसे ऐसा ही था यह कहना ठीक लिख डाला मालूम पड़ता है। ऐतिहासिक दृष्टिमें नहीं। वह कैसी भी हो, इस आचार्यके वक्तव्य यह बात मूल्य नहीं रखती । ' पार्वाभ्युदय' के का विचार करने में कोई वाधा नहीं, क्योंकि 'देव- टीकाकारने उस काव्यमें 'भुवनमवतु देवः सर्वदास्य नृपतुंगस्य वर्धतां तस्य शासनम्' इस प्रकार मोघवर्षः' इस प्रकारके एक आशीर्वचनसे इसके वक्तव्यसे वह नपतुंग उस वक्त शासन (बहुशः आप सुनी हुई जनश्रुतिका आधार लेकर) करते हुए व्यक्तिसे भिन्न राज्यभारसे निवत्त बड़े भारी अतिशयोक्तिपूर्ण कथा-तन्तु-जालको (अर्थात् पहिले शासन किया हुआ ) नरेश, यह बुना होगा ऐसा मालूम पड़ता है । पर योगिराद् अर्थ नहीं होता; पर ई० स० ८७७ तक नृपतुंग पंडिताचार्य के समान यह (वीराचार्य) जिनसेन, जैन नहीं था यह बात हम पहिले अवगत कर नृपतुंगसे ५५०–६०० वर्षों के इधरका व्यक्ति नहीं चुके हैं। हैं, (बहुशः) उनके समकालीन होगा, इस प्रकार उस समय जिनसेनाचार्य जैन मताप्रगण्य आक्षेप करने पर, जिनसेन और उसके खास था; नृपतुंगने एक बार भो उसे वन्दन किया होगा शिष्य और अमोघवर्षे-नृपतुंगके शासनमें भी, तो उस पर इस नरेशकी श्रद्धा हो सकती है । ऐसी उसके समयानन्तर उसके पुत्र अकालवर्षके शासन अवस्थामें इस 'गणितसारसंग्रह' में उस जिन- में भी विद्यमान गुणभद्रसे भी जो बात नहीं कही सेनका नाम क्यों नहीं ? नृपतुंग जन्मसे जन धर्मी गई उसको इस महावीराचार्य ने कहा है तो उसे नहीं था यह बात सभी जानते हैं; यदि वह जैनी ऐतिहासिक तथ्य कैसे मान सकते हैं ?
SR No.527165
Book TitleAnekant 1940 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1940
Total Pages60
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size7 MB
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