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________________ वर्ष ३, किरण ११] गोम्मटसार कर्मकाण्डकी त्रुटि पूर्ति पर विचार कर्मकाण्डकी २० वीं और २१ वीं गाथायें सुसंगत जान कर छोड़ दिया है। उनका अभिप्राय केवल उन प्रतीत होती हैं । उनके बीच उक्त पांच गाथायें डालने भेद-प्रभेदोंका वर्णन कर देना रहा है जिनमें उन्हें कुछ से उनमें व्युत्क्रम उत्पन्न होता है। विशेषता दिखाई दी और जिनकी ओर पाठकोंका ध्यान कर्मकाण्डकी आठ कर्मों के उदाहरण देने वाली २१ आकर्षित करना उन्हें आवश्यक जंचा । ज्ञानावरण वीं गाथाके पश्चात् २२ वीं गाथामें उन पाठों कर्मोकी और दर्शनावरणके भेद-प्रभेदोंका ज्ञान जीव काण्डमें उत्तर प्रकृतियोंकी संख्याका क्रमिक निर्देष किया गया भी कराया जा चुका है, जहां कर्म प्रकृतिकी इन्हीं १२ है जो बिल्कुल सुसंगत है । उनके बीचमें कर्म प्रकृतिकी गाथाओं में से है गाथायें प्राचुकी हैं। उन सबकी यहां आठ कर्मोंके स्वभाव विषयक दृष्टान्तोंको स्पष्ट करके पुनरावृत्ति करनेकी अपेक्षा प्राचार्यने केवल उन स्थलों बतलाने वाली २८ से ३५ तककी आठ गाथाओंकी पर अपनी अंगुली रखी है जिनका ज्ञान उस सामान्य कोई विशेष आवश्यकता दिखाई नहीं देती, खास कर प्ररूपणसे नहीं हो सकता था । निद्रादिके लक्षण इसी जबकि उनके दृष्टान्त आचार्य २१ वी गाथामें दे चुके प्रकारके हैं और इसलिये मात्र उन्हींका यहाँ वर्णन हैं । ये पाठ गाथायें २१ वी गाथाके स्पष्टीकरणार्थ टीका करना प्राचार्यने उचित समझा । इसमें कोई त्रुटि रूप भले ही मान ली जावें, किन्तु सार ग्रन्थके मूलपाठ न्याल करना अनावश्यक है। में उनकी गुंजाइश नहीं दिखाई देती। ठीक यही बात कर्मप्रकृतिकी उन दो गाथाओं ___ कर्मकाण्डकी २२ वीं गाथामें उत्तर प्रकृतियोंकी और १४ गाथाओं व ४ गाथाओंके विषयमें कही जा क्रमिक संख्या बता देने के पश्चात् २३ वी गाथासे एक सकती है जिनको क्रमशः कर्मकाण्डकी २५ वीं, २६ दम पांच निद्राओंका कार्य प्रारम्भ हो जाता है। यह वीं और २७वीं गाथाके पश्चात् रख देनेकी तजवीज की एक विशेष स्थल है जहां पं० परमानन्दनीको कर्मकाण्ड गई है । यथार्थतः उनसे सिवाय नाम निर्देष और की त्रुटि बहुत खटकी है, क्योंकि उनके मतानुसार सामान्य स्वरूप ज्ञानके कोई नया प्रकाश नहीं मिलता। विषयको पूरा और सुसंगत बनाने के लिये यहां उत्तर उनमें से सात गाथायें जीवकाण्डमें आ भी चुकी हैं । प्रकृतियोंके नाम व स्वरूपका क्रमशः वर्णन होना चाहिये दर्शन मोहनीयमें बंध मिथ्यात्वका और उदय तथा था और उसीमें निद्राका यथास्थान विवरण आता तब सत्त्व तीनोंका रहता है, अतः शेष दो प्रकृतियोंका ठीक था। इसी कमीकी ये कर्म प्रकृतिकी ३० से ४८ अस्तित्व कैसे हो जाता है, इस विशेषताका ज्ञान तककी १२ गाथाओं द्वारा पूर्ति करते हैं । इस सम्बन्धमें करानेके लिये कर्मकाण्डमें गाथा नं० २६ निबद्ध कर्मकाण्डकी रचनाकी विशेषताकी ओर हमारा ध्यान की गई है, तथा पाँच शरीरोंसे संयोगी भेद कैसे बन जाता है, और सारे ग्रन्थको देखते हुये हमें ऐसा प्रतीत जाते हैं, इस विशेषताको बतलानेके लिये गाथा नं. होता है कि यहां तथा आगामी त्रुटि पूर्ण नंचने वाले २७ रखी गई है । नामकर्मकी प्रकृतियोंमें अंग और स्थलों पर कर्ताका विचार स्वयं प्रकृतियोंके भेदोपभेदों उपांगका भेद किस प्रकार हुआ इस विशेषताको गिनानेका नहीं था । वह सामान्य कथन या तो उनकी दिखाने वाली गाथा नं० २८ रखी गई है। शेष भेदरचनामें आगे पीछे आचुका है,या उन्होंने उसे सामान्य प्रभेद तो सामान्य हैं, अतः जान बूझकर भी वे यहाँ
SR No.527165
Book TitleAnekant 1940 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1940
Total Pages60
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size7 MB
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