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द्वितीय सन्धि में सुभौम चक्रवर्ती की उत्पत्ति और परशुराम के मरण का वर्णन किया गया है। तृतीय सन्धि में पद्मरथ राजा का उपसर्ग सहन, आकाशगमन, विद्यासाधन और अंजनचोरका निर्वाण-गमन वर्णित है। चतुर्थ सन्धि में अनन्तमतीकी कथा आया है। पंचम सन्धि में निर्विचिकित्सा गुण का वर्णन आया है। षष्ठ सन्धि में अमूढदृष्टि गुण का वर्णन है। सप्तम सन्धि में उपगूहन और स्थितिकरण के कथानक आये हैं । अष्टम सन्धि में वात्सल्यगुण की कथा वर्णित है। नवम सन्धि में प्रभावना अंग की कथा आयी है। दशम सन्धि में कौमुदी - यात्रा का वर्णन है। ग्यारहवीं सन्धि में उदितोदय सहित उपदेशदान वर्णित है। बारहवीं सन्धि में परिवारसहित उदितोदयका तपश्चरण-ग्रहण आया है। 13वीं सन्धि में सोमश्री की कथा वर्णित है। 16वीं सन्धि में काशीदेश, वाराणसी नगरी के वर्णन के पश्चात् भक्ति और नियमों का वर्णन है। 17वीं सन्धि में अनस्तमित करने वालों की कथा वर्णित है। 19वीं सन्धि में नरकगति के दुःखों का वर्णन किया गया है। 20वीं सन्धि में बिना जाने हुए फल - भक्षण के त्याग की कथा वर्णित है। 21वीं सन्धि में उदितोदय राजाओं की परिव्रज्या और उनका स्वर्गगमन आया है। इस प्रकार इस ग्रन्थ में सम्यग्दर्शन के आठ अंग, व्रतनियम, रात्रिभोजनत्याग आदि के कथानक वर्णित है । कथाओं के द्वारा कवि ने धर्म-तत्त्व को हृदयंगम कराने का प्रयास किया है।
इस प्रकार विशालकाय यह दंसणकहरयणकरंडु काव्य कोटि का ग्रन्थ है। इसमें रस, छन्द तथा अलंकारों का भूरिशः प्रयोग है ग्रन्थ के नामानुसार विषय की प्रमुखता होने पर भी अन्यान्य अनेक विषयों का वर्णन प्रसंगोपात्त किया गया है।
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दंसणकहरयणकरंडु ग्रन्थ दर्शनशास्त्र, आचारशास्त्र एवं भारतीय जीवनमूल्यों की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसमें जैनदर्शन मान्य दार्शनिक विचारों का वर्णन भी विस्तार से उपलब्ध होता है । कर्मसिद्धान्त का विवेचन भी उक्त ग्रन्थ का प्रमुख प्रतिपाद्य है। बीच-बीच में कथाओं का उल्लेख होने से जैन इतिहास की परम्परा का ज्ञान भी होता है। इसमें कथाओं के माध्यम से भारतीय जीवनमूल्यों का प्रतिपादन किया गया है। जैनपरम्परा में भक्ति का क्या महत्त्व है ? भक्ति का क्या स्वरूप है ? आदि तथ्य भी उपर्युक्त ग्रन्थ में प्राप्त होते हैं । व्रत, नियम, त्याग, तपस्या का स्वरूप भी इस ग्रन्थ में विस्तार से मिलता है। सदाचार पालन मानव जीवन में अत्यावश्यक है, इसके तो कदम-कदम पर सूत्ररूप में उल्लेख मिलते हैं । सद्गृहस्थ को क्या सेवनीय है? तथा क्या असेवनीय है? इसका वर्णन भी प्रकृतग्रन्थ में है। जैन परम्परा मान्य दीक्षा (प्रव्रज्या) का स्वरूप, कथाओं के माध्यम से दंसणकहरयणकरंडु में प्रतिपादित किया गया है।
विषय वर्णन के साथ इस ग्रन्थ में साहित्यिक सम्पदा भी बहुशः उपलब्ध होती है। यह ग्रन्थ काव्यशास्त्रीय गुणों से अलंकृत है अतः दंसणकहरयणकरंडु ग्रन्थ अनेक विद्याओं का कोशग्रन्थ बन गया है।
दंसणकहरयणकरंडु ग्रन्थ भारतीय वाङ्मय में दार्शनिक, नैतिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। साहित्यिक कोटि का ग्रन्थ होने से भी यह अत्यन्त उपयोगी है। इसके सम्पादन से भारतीय विद्या के अनेक पक्षों पर प्रकाश प्रसरित होगा । साथ ही साथ प्राकृत अपभ्रंश भाषा के साहित्यिक संसार में एक नई उपलब्धि अर्जित होगी।
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अर्हत् वचन 23 (1-2), 2011