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2378 है किन्तु वह प्रति अभी तक उपलब्ध नहीं हो पाई है। (2) नागौर के विशाल ग्रन्थ भण्डार में भी इस पाण्डुलिपि की 2 प्रतियाँ हैं ऐसी सूचना राजस्थान विश्वविद्यालय, जैन अनुशीलन केन्द्र से प्रकाशित केटलॉग द्वारा प्राप्त हुई है?।
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दंसणकहरयणकरंडु की रचना विक्रम सम्वत् 1123 ( ईस्वी सन् 1066 ) में श्रीचंद कवि ने की थी । रचनाकर्ता श्रीचंद कवि जब श्रावक थे, तभी उन्होंने इस ग्रन्थ की रचना प्रारम्भ की थी। ग्रन्थकार के लिए दंसणकहरयणकरंडु की 16 संधि के बाद की प्रत्येक संधि के अन्त में पुष्पिका वाक्यों में मुनि उपाधि उल्लिखित है। इससे लगता है कि वे जीवन के उत्तरार्ध में त्याग, वैराग्य, संयम की मूर्तिरूप मुनि हो गये थे। 1 से 16 तक संधियों में कवि तथा पण्डित उपाधि लिखित है, इससे यह भी प्रतीत होता है कि श्रीचंद कवि इस संधि के लिखे जाने तक श्रावक अर्थात् सद्गृहस्थ ही थे। कवि और पण्डित उपाधि से सिद्ध होता है कि श्रीचंद कवि, साहित्य, दर्शन एवं अध्यात्म के उद्भट विद्वान् थे। मुनि उपाधि से उनके वैराग्य, त्याग एवं संयम का ज्ञान होता है ।
श्रीचंद कवि की अद्यावधि मात्र दो रचनाएँ प्राप्त हैं- 1. दंसणकहरयणकरंडु 2. कहाकोसु। कहाकोसु का सम्पादन तो हो चुका है किन्तु उसका हिन्दी अनुवाद अद्यावधि नहीं हुआ है।' दंसणकहरयणकरंडु का आज तक सम्पादन भी नहीं हुआ है। इसका प्रकाशन प्राकृत ग्रन्थ परिषद्, स्वाध्याय मण्डल, जैननगर, पालडी, अहमदाबाद (गुजरात) से हुआ है।
दंसणकहरयणकरंडु नामक ग्रन्थ तत्कालीन कर्णनरेश के राज्य में श्रीमालपुर में लिखा गया था। कर्ण सोलंकी नरेश भीमदेव के प्रथम उत्तराधिकारी थे और उन्होंने ईस्वी सन् 1064 से 1094 तक राज्य किया था । श्रीमाल अपरनाम भीनमाल दक्षिण मारवाड़ की राजधानी थी। सोलंकी नरेश भीमदेव ने सन् 1060 में वहाँ के परमारवंशी राजा कृष्णराज को पराजित कर बन्दीगृह में डाल दिया था और भीनमाल पर अपना अधिकार जमा लिया था जो उनके उत्तराधिकारी राजा कर्ण तक स्थिर रहा प्रतीत होता है।
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दंसणकहरयणकरंडु ग्रन्थ प्राकृत - अपभ्रंश साहित्य का प्रतिनिधि ग्रन्थ है। इसमें सन्दर्भ श्लोकों के रूप में संस्कृत भी है इसमें जैन परम्परा के अनुसार श्रावक की आचार-संहिता का विस्तार से वर्णन है। भारतीय परम्परा में गृहस्थ कैसा होना चाहिए, इसका उत्तर इस ग्रन्थ में सहजरूप से प्राप्त होता है। जैन परम्परा में सप्त परम स्थान माने गये हैं। उनमें सद्गृहस्थ को भी इन सप्त परमस्थानों में गिना है। उक्त ग्रन्थ सद्गृहस्थाचार / श्रावकाचार का विस्तार से वर्णन करता है।
दंसणकहरयणकरंडु ग्रन्थ में 21 सन्धियाँ हैं प्रथम सन्धि में देव, गुरु और धर्म तथा गुणदोषों का वर्णन हैं। इसमें 39 कड़वक हैं । उत्तमक्षमादि दशधर्म, 22 परीषह, पंचाचार 12 तप आदि का कथन किया है पंचास्तिकाय और षड़द्रव्यका वर्णन भी इसी सन्धि में आया है । समस्त कर्मों के भेद-प्रभेद का कथन भी प्राप्त होता है । कवि ने नामकर्म की 42 प्रकृतियों का विस्तार से वर्णन किया है।
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अर्हत् वचन 23 (1-2), 2011
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