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अपभ्रंश भाषा का साहित्य सृजन हुआ। पिछले 200 वर्षों में अपभ्रंश साहित्य के लेखन, पठन-पाठन की परम्परा लुप्त प्रायः हो गई थी। तब डॉ. हर्मन जैकोबी, रिचर्ड पिशेल, पिटर्सन, डॉ. आल्सडॉर्फ एवं डॉ. गुणे, पी.एल. वैद्य, डॉ. हरिवल्लभ भायाणी, डॉ. हीरालाल जैन आदि देशीय एवं वैदेशिक विद्वानों ने वर्तमान में अपभ्रंश जगत् में अध्ययन/ अनुसंधान/सम्पादन की क्रान्ति उत्पन्न की थी। इस क्रान्ति-सूर्य की कुछ किरणें विकीर्ण हुई किन्तु, आज भी प्राकृत-अपभ्रंश के कई प्राचीन ग्रन्थों का अध्ययन/अनुसन्धान/सम्पादन शेष है। यह कार्य अनेक शताब्दियों की अपेक्षा रखता है।
प्राकृत-अपभ्रंश की हजारों पाण्डुलिपियाँ अभी ग्रन्थ भण्डारों में हैं, जिनका सम्पादन/अनुवाद शेष है। सम्पादन/अनुवाद तो बहुत दूर की बात है, किन्तु प्राकृत अपभ्रंश पाण्डुलिपियों की अद्यावधि एक व्यवस्थित अनुक्रमणिका भी तैयार नहीं है। गुजरात और राजस्थान में प्राकृत-अपभ्रंश भाषा की सर्वाधिक पाण्डुलिपियाँ हैं। राजस्थान के जयपुर शहर में भी प्राकृत-अपभ्रंश की सैंकड़ों असम्पादित दुर्लभ पाण्डुलिपियाँ विद्यमान हैं। पाण्डुलिपियों की खोज में एक दंसणकहरयणकरंडु नामक एक पाण्डुलिपि की अनेक प्रतियाँ जयपुर के अनेक भण्डारों में विद्यमान हैं। जिनका परिचय क्रमशः इस प्रकार हैं
(1) आमेर शास्त्र-भण्डार, अपभ्रंश साहित्य अकादमी, नारायण सिंह सर्किल, सवाईमानसिंह रोड, जयपुर, इसमें दंसणकहरयणकरंडु की 5 प्रतियाँ विद्यमान हैं। ये सभी प्रतियाँ अलग-अलग समय की है। 1. वेष्ठन सं. 878 - यह पाण्डुलिपि वि.सं. 1582 की है। इसकी प्रशस्ति में ऐसा उल्लेख है। 159 पत्रों वाली यह पाण्डुलिपि है और सुस्पष्ट अक्षरों वाली है, घंटियालीपुर स्थान में यह लिखी गई थी। 2. दूसरी पाण्डुलिपि भी आमेर शास्त्र भण्डार में है। इसका वेष्ठन सं. 879 है। लिपिकाल सं. 1589 है। पत्र संख्या 123 है। यह पाण्डुलिपि पूर्ण है। यह पूर्णतः भीग गई थी। इसका जीर्णोद्धार कराया गया है। राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन की पाण्डुलिपि संरक्षणशाला में चिपके पत्रों को अलग कराकर इस पाण्डुलिपि को सुरक्षित किया गया है। इसका लेखन स्थान चम्पावती है, ऐसा प्रशस्ति में उल्लेख है। 3. तीसरा वेष्ठन सं. 880 है। पत्र सं. .157 है। इस पाण्डुलिपि का लिपि काल संवत् 1563 है। इसके पत्र भी चिपक गये थे। राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन की संरक्षणशाला में इसका उपचार कराकर इसे सुरक्षित किया है। इसकी प्रशस्ति अपूर्ण हे। 4. वेष्ठन सं. 881 है। पत्र सं. 145 है। यह प्रति भी भीग गई थी। इसको राष्ट्रीय मिशन की पाण्डुलिपि संरक्षणशाला में उपचार कराकर सुरक्षित किया है। इस पाण्डुलिपि का लिपिकाल सं. 1614 है। यह भी स्पष्ट अक्षरों वाली है। 5. वेष्टन सं. 882 है। पत्र संख्या 189 है। लिपिकाल 1582 है। इसकी प्रशस्ति अपूर्ण है।
दिगम्बर जैन महासंघ, तेरापंथी बड़ा मन्दिर में भी दंसणकहरयणकरंडु नामक ग्रन्थ की 3 प्रतियाँ उपलब्ध हैं। प्रथम पाण्डुलिपि की वेष्टन संख्या 1490 है। क्रमांक 1691 है। इसमें 142 पत्र है। यह अत्यन्त जीर्ण और अस्पष्ट है। पत्र संख्या 1 फटा है। पत्र संख्या 137 नहीं है। दूसरी प्रति का वेष्टन संख्या 1491 है। इसका क्रमांक 1692 है। यह प्रति अपूर्ण तथा प्रशस्ति रहित है। इसमें पत्र संख्या 6 से 122 तक (117) है। प्रति अत्यन्त जीर्ण है। इसको राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन की संरक्षणशाला में उपचार कराकर सुरक्षित किया है। दिगम्बर जैन तेरापंथी मन्दिर में एक प्रति और है जिसका वेष्टन संख्या
अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011