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________________ से जुड़े थे, जहाँ वह विश्राम व धर्माचरण किया करते थे। नैनागिरी की जैन कला का विकास भी 1011वीं शती ईसवी का एक मंदिर यहाँ पर है। इस मंदिर का निर्माण 1109 संवत् में हुआ था। इसी मंदिर में 11वीं शताब्दी की 13 प्रतिमाएँ भी हैं। नैनागिरी में कुल 53 मंदिर हैं जिनमें 38 मंदिर पहाड़ी पर 13 तलहटी में एवं 2 मंदिर पारस सरोवर में स्थित हैं। नैनागिरी क्षेत्र से अन्य प्राचीन जैन प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं। जो एक अस्थाई संग्रहालय में संग्रहीत हैं। नैनागिरी क्षेत्र ट्रस्ट कमेटी एवं श्री सुरेश जैन (पूर्व आई.ए.एस.) संग्रहालय निर्माण के लिये प्रयासरत हैं। संग्रहीत महत्वपूर्ण प्रतिमाओं का विवरण निम्नानुसार है - प्रतिमा क्रमांक -1 नैनागिरी से यह एक विलक्षण प्रतिमा प्राप्त हुई है। इस प्रतिमा में दो अलग-अलग आकृतियों का समान स्तर पर साथसाथ मूर्तांकन किया गया है बाँयी प्रतिमा स्पष्टतः तीर्थंकर पार्श्वनाथ की है। तीर्थंकर पार्श्वनाथ कायोत्सर्ग मुद्रा में ध्यानस्थ हैं। कुँचित केश एवं सिर पर सप्त सर्पफण हैं। सर्पफण के ऊपर त्रिछत्र हैं। त्रिछत्र के दोनों ओर गजराज कलश लिये अभिषेक कर रहें हैं पार्श्व में चामरधारी है दायीं ओर दूसरी आकृति त्रिभंग मुद्रा में एक पुरुष की आकृति है । जो छोटे से प्रभामंडल के साथ सिंहासन पर ही है। पुरूष आकृति की पहचान स्पष्ट नहीं है। पुरूष विभिन्न आभूषण जैसे कर्ण-कुंडल, कंठहार, कंगन, वनमाला, वाजूबंध एवं कटिसूत्र आदि से अलंकृत हैं। पुरूष आकृति की दोनों हथेलियों में क्या था ? स्पष्ट नहीं है, टूट गया है। ऐसी ही दो विलक्षण प्रतिमाएँ शिवपुरी जिले की खनियाँधाना तहसील के गुडार ग्राम के निकट गोलाकोट नामक स्थल से प्राप्त हुई हैं। इन प्रतिमाओं को डॉ. नवनीत जैन ने सूर्यप्रभा नामक स्मृति ग्रंथ में प्रकाशित किया है। गोलाकोट एवं नैनागिरी से प्राप्त इन प्रतिमाओं में कुछ अंतर भी है। नवनीत जैन द्वारा प्रकाशित प्रतिमा में पार्श्वनाथ सिंहासन पर एवं पुरुष आकृति सादी पीठिका पर है । जबकि नैनागिरी की इस प्रतिमा में दोनों (पार्श्वनाथ एवं पुरुष आकृति) सिंहासन पर हैं। गोलाकोट की प्रतिमा में दोनों के वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह है जबकि नैनागिरी की प्रतिमा में केवल पार्श्वनाथ के वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह है। गोलाकोट की पुरुष आकृति दायें हाथ में कमंडल लिये है। नैनागिरी की पुरुष आकृति की हथेली टूटी है। नवनीत जैन ने गोलाकोट की प्रतिमा को मुनि पार्श्वनाथ एवं तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा माना है | नैनागिरी से प्राप्त यह प्रतिमा राजकुमार पार्श्व एवं तीर्थंकर पार्श्वनाथ की है नैनागिरी की प्रतिमा में पुरुष आकृति के वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिन्ह एवं कमंडलु नहीं है अतः वह मुनि अवस्था के पार्श्वनाथ नहीं है। लेकिन सिंहासनासीन एवं प्रभामंडल युक्त है अतः राजकुमार पार्श्वनाथ हो सकते है। प्रतिमा क्रमांक - 2 इस प्रतिमा में देवी बालक को गोद में लिये खड़ी हैं। देवी के मुख पर ध्यान एवं आध्यात्मिक शांति है। नेत्र अर्द्धउन्मीलित हैं। देवी गले, बाजू, कलाई, एवं कमर पर सादा आभूषण धारण किए हैं। सिर पर पंच सर्पफण हैं बालक के कुंचित केश हैं। यह प्रतिमा 120 से.मी. ऊँची है। लगभग 160 से.मी. ऊँची ऐसी ही प्रतिमा पापेट (बंडा सागर) से प्राप्त सागर विश्वविद्यालय के संग्रहालय में भी अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011
SR No.526589
Book TitleArhat Vachan 2011 01 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2011
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size2 MB
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