SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 43
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अर्हत वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर वर्ष - 23, अंक - 1-2, जनवरी-जून 2011, 43-47 नैनागिरी की प्राचीन जैन प्रतिमाएँ - जिनेन्द्र जैन* सारांश मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित नैनागिरी (रेशंदीगिरि) दिगम्बर जैन परम्परा का एक प्रसिद्ध तीर्थ है। इस तीर्थ से प्राप्त कतिपय प्राचीन प्रतिमाओं का विवरण यहां प्रस्तुत है। नैनागिरी छतरपुर जिले (म.प्र.) का महत्वपूर्ण एवं प्रसिद्ध तीर्थ क्षेत्र है । नैनागिरी सिद्ध क्षेत्र के साथ ही अतिशय क्षेत्र भी है। यह बिजावर तहसील में स्थित है। सागर जिला मुख्यालय से 40 कि.मी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 86 पर स्थित दलपतपुर से 13 कि.मी. की दूरी पर नैनागिरी है। नैनागिरी को ही रेशंदीगिरी माना गया है । रेशंदीगिरी को साहित्यिक आधार पर लगभग 2900 वर्ष प्राचीन माना गया है। प्राकृत ग्रंथ निर्वाण कांड गाथा में वर्णन है कि तेईसवें तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ का समवशरण रेशंदीगिरी आया था। निर्वाण कांड में वर्णन है कि रेशंदीगिरी से वरदत्त आदि पाँच मुनिराज ने मोक्ष को प्राप्त किया था। वह पाँच मुनिराज श्री पार्श्वनाथ के समवशरण में और उनके मुनिसंघ में थे। 18वीं शती ईसवीं के बाद रेशंदीगिरी का नाम नैनागिरी भी हो गया। 17वीं शताब्दी के मराठी साहित्यकार चिमड़ा पंडित ने तीर्थ वंदना लिखी जिसमें उन्होंने भी गुरुदत्त और वरदत्त मुनियों का मुक्ति स्थान रेशंदीगिरी माना है। बाद के विद्वानों ने निर्वाणकांड के भाषानुवाद में रेशंदीगिरी नैनानंद लिखा है। 2 कालान्तर में रेशंदीगिरी ही नैनागिरी नाम से प्रसिद्ध हो गया। तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ के बाद रेशंदीगिरी में जैन संस्कृति की निरन्तरता के प्रमाण प्राप्त नहीं होते है। एक लम्बे अंध युग के पश्चात संभवतः प्राचीन भारत के स्वर्ण युग गुप्तकाल के पश्चात नैनागिरी का विकास पुनः होने लगा। 10-11वीं शती ईसवी तक यह क्षेत्र जैन संस्कृति का महत्पपूर्ण स्थल बन गया। 1012वीं शती ईसवी के काल में नैनागिरी के साथ ही इस क्षेत्र के चारों ओर जैन संस्कृति का समृद्ध विकास हो रहा था। प्राचीन व्यापारिक मार्गों में संभवतः एक व्यापारिक मार्ग नैनागिरी से अवश्य जाता होगा। इस भौगोलिक क्षेत्र में पाणाशाह का श्रेष्ठी संगठन व्यापार किया करता था। पाणाशाह के अभिलेख भी प्राप्त हुए हैं। मध्यप्रदेश से होकर अनेक बड़े राजमार्ग विभिन्न दिशाओं को जाते थे। ये मार्ग मुख्यतः व्यापारिक सुविधा हेतु बने थे। धर्म प्रचार तथा साधारण आवागमन के लिये भी इनका उपयोग होता था। एक बड़ा मार्ग इलाहाबाद जिले के कोशाम्बी नगर से भारहुत, एरण, गयारसपुर तथा विदिशा होते हुए उज्जैन को जाता था। उज्जैन से प्रतिष्ठान (ग्वालियर), कांतिपुरी (मुरैना), तुम्बवन (तुमैन) देवगढ़ होता हुआ विदिशा को जाता था। सागर संभाग का क्षेत्र भी इन व्यापारिक मार्गों से जुड़ा हुआ था । नैनागिरी एक ओर पजनारी, पाटन, पिड़रूआ, ईशरवारा, एरण, ग्यारसपुर होते हुए विदिशा व उज्जैन से जुड़ा हुआ था, वहीं दूसरी ओर द्रोणगिरी, अहार, पपौरा, खजुराहो, सतना होते हुए कोशाम्बी से जुड़ा होगा। इन तीर्थ क्षेत्रों का जैन शिल्प 10-11वीं शती ईसवी से बहुतायत में प्राप्त होता है। 10वीं से 14वीं शती ईसवी तक व्यापारिक संगठनों द्वारा इन जैन तीर्थ क्षेत्रों के विकास में पर्याप्त योगदान किया गया। अनेक स्थलों जैसे ईशरवारा, पजनारी, चंदेरी, अहार, खजुराहो आदि से तदविषयक अभिलेख भी प्राप्त हए हैं। स्पष्ट है कि यह क्षेत्र इन व्यापारियों के अपने व्यापारिक मार्गों * संविदा व्याख्याता, प्रा.भा. इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, डॉ. हरिसिंह गौर वि.वि., सागर (म.प्र.)
SR No.526589
Book TitleArhat Vachan 2011 01 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2011
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size2 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy