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________________ संख्या अथवा रेखा के माध्यम से सम्पादित कर सकते हैं। ये परस्पर विनिमेय भी होती है और अपने स्वतंत्र रूप में भी रह सकती हैं तदपि अंक का सर्वत्र प्रयोग होता है। एक ही क्रिया की तीन अवस्थाएं अनिवार्य रूप में व्यक्त होती हैं। गणित का आश्चर्यजनक विस्तार हमें भाषा में भी देखने को मिलता है। संस्कृत में विभाजन का प्रायोगिक और सुसंगत उदाहरण है विभक्ति । हिंदी में जो कारक हैं वे ही संस्कृत में विभक्ति हो जाती हैं अर्थात् क्रिया किसी माध्यम के सहारे कारक बनकर सात रूप धारण करती है। अंक और संख्या वैसे ही घटक हैं जैसे अक्षर और शब्द । प्रकृति की क्रमिक गति और आवर्तनशीलता को मापने के लिए संख्यापरक गणना आवश्यक होती है और यही आवृत्तिपरकता हमारे जीवन में संख्या को प्रविष्ट भी करती है और फलित भी । आधुनिक अंक शास्त्र ने हमारे जीवन में संभावित सुखद या दुखद परिस्थितियों का पूर्वानुमान करने की एक विश्वसनीय पद्धति दी है। समष्टि तरंगों का फलित है और उसमें कोई भी तरंग निरपेक्ष नहीं है। लघु से लघु तरंग विराट से जुड़ी हुई है और तरंगों का यह व्यापार ही संसार के वैचित्र्य का कारण बनता है। इसके साथ ही यह भी समझ लेना चाहिए कि गति केवल वृत्तबद्ध नहीं होती इसमें कोणिक स्थितियां भी बनती हैं। वस्तुतः कोण गति की मूल अवस्था है, वह स्वयं में गति होकर भी अपनी ही विशिष्ट भंगिमा (जो वर्तुल है) को प्रेरित करती है। गति के समीकरण में कोण भी आते हैं जो सहज रूप से बन जाते हैं और वे अप्रत्यक्ष रूप से हमारे गणित को अधिक सारवान बना देते हैं । व्यवहार में संख्या की ऊर्ध्वाधर अथवा दक्षिण गति होती है। पहाड़ों या गिनती के क्रम में लिखने पर हम ऊपर से नीचे चलते हैं किन्तु क्रियाशीलता में हम दक्षिणावर्त गति से अर्थात दाहिने से बायें चलते हैं। अंग्रेजी भाषा की सी विचित्रता हमें गणित में भी मिलती है कि लिखते समय हम वामावर्त गति से लिखते है । गणित में तीन तरह की गति व्यवहार में देखने में आती है ऊर्ध्वाधर । गिनती व पहाड़े लिखते हैं तो उन्हें क्रमिक युति, अंकों के विकास किंवा वृंहण की परिपाटी है। संख्या लेखन अथवा गुणा भाग में वह वामावर्त एवं दक्षिणावर्त विधि से विकसित होती है। सामान्य व्यवहार के अनुसार ऊर्ध्वाधः अथवा पूर्व पश्चिम एक गणना क्रम का विकास ही है। वह परिवर्तन से क्षुण्ण नहीं होता। हमारे यहां पृथ्वी की पूर्वाभिमुखी गति के कारण सूर्य पश्चिम गति दिखता है। इसी को हम ऊध्वार्थः मान लेते हैं ये केवल क्रम हैं, सूचक हैं, कारक नहीं । वैज्ञानिक अवधारणा के अनुसार भी पूर्व पश्चिम न्यूट्रल रहते हैं जबकि उत्तर-दक्षिण से धनऋण प्रकृति की धारायें प्रवाहित होती है। हमारे पिण्ड प्रथ्वी में उत्तर गोलक से घनात्मक धारा निर्गत होती है और दक्षिण से ऋणात्मक । व्यक्ति के पिण्ड में सिर घनात्मक और पैर ऋणात्मक विद्युत धारा के निर्गम स्थान माने जाते हैं। यही सोचकर हमारे ऋषिजनों ने उत्तर की तरफ सिर करके सोने का निषेध किया था क्योंकि समान प्रकृति की अलक्ष्य धाराओं में परस्पर आकर्षण होने से व्यक्ति की शक्ति में ह्रास हो सकता है और उत्तर की ओर पैर करने से दोनों धाराओं में प्रकृति वैषम्य होने से आकर्षण नहीं होगा । व्यवहार में हम दक्षिण को निर्गम की और उत्तर को आगम की दिशा मानते हैं। यही सिद्धांत गणित के गुणन और भजन की गति में भी प्रकट होता है। ह्रास से वृद्धि की ओर बढ़ने की सूचना हम वामावर्त गति से देते हैं अर्थात् निरन्तर वृद्धि व विकास की कामना करने वाला दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ता है। ऐसी ही स्थिति गुणन क्रिया में होती है। वहां अंकों को गुणित करने का क्रम बांये से दांये अर्हतु वचन 23 (1-2), 2011 32
SR No.526589
Book TitleArhat Vachan 2011 01 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2011
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size2 MB
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