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चलता है । यह क्रम जब परावर्तित होता है तो भजन क्रिया कहलाता है। किंतु तब इसका गतिक्रम भी परिवर्तित हो जाता है अर्थात् उत्तर से दक्षिण की ओर, दाहिने से बाएं।
संख्याओं का प्रारंभ शून्य से होता है । संसार का प्रारंभ भी इसी बिन्दु से होता है । वर्णमयी मातृका में तो संसार अवस्थित ही नहीं गतिशील भी है। जिसका प्रमाण आत्मा शब्द स्वयं है।आत्मा का अर्थ होता है गतिशील अत् धातु जो गत्यर्थक है उससे आत्म शब्द बनता है यही स्थिति काल शब्द की है और ऐसा ही अर्थ सरस्वती शब्द का होता है अर्थात संसार (जो व्यवस्थित क्रम से चलता है, उसे संसार कहते है) गति का परिचय है स्थिरता इसमें आकाश तत्व की तरह निगूढ़ एवं आवृत रहती है।
भाषा के आधार पर विकासकथा का परीक्षण करने पर हमें कुछ तथ्य प्राप्त होते हैं जैसे शब्दावली में दो परस्पराभिमुख अवस्थाओं को अभिव्यक्त करने वाली क्रिया या संज्ञा प्राप्त होती है । अंकों में यह स्थिति चिन्हों में अभिव्यक्त होती है। ये चिन्ह विपरीत वृत्ति एवं क्रिया के बोधक बनते हैं और ये क्रियाएं भी द्वन्द्व रूप में वर्गीकृत हैं। भाषा किंवा संख्याओं को द्वन्द्वमयी अवस्था में मुक्त करने के लिए हम जिस संकेतक का प्रयोग करते हैं - वह संख्या में शून्य और भाषा में अतीत, पर, परम जैसे पदों से व्यक्त होता
अंकों में व्यवहित शून्य को पूर्णत्व का प्रतीक भी मानते है और यह बिंदु का ही चरित्र है कि वह गति की किसी भी क्रिया से व्याहत नहीं होती। यह स्थिति इस तथ्य की सूचक है कि द्वन्द्वात्मक अवस्था के मूल में एक ही प्रकट द्वित्व का प्रारंभिक होता है यह रेखा वलय । विस्तृत अर्थ में इसे ब्रह्माण्ड का रेखांकन भी कहा जा सकता है कि प्रत्येक ब्रह्माण्ड की ऐसी ही आकृति होती है।
रेखा का अस्तित्व उस निरपेक्ष अव्यव सत् की विशुद्ध अवस्था है और यही से गणित का विभाग होता है। शून्य की रेखायें विविध आयामों का परिमापन प्रकाशन करती हुई अनन्तता की ओर अग्रसर होती है। यही प्रस्तार क्रम रेखागणित के इस सिद्धांत का आधार है कि बिंदु का विकास त्रिकोण में होता है।
वर्ण मातृका में स्वर और व्यंजन के रूप में दो वर्ग है, उभयरूपता है । व्यंजन व्यक्त होते हैं और स्वर उन्हें विकसित करते हैं। यद्यपि वर्णमातृका का विस्तार व्यंजन से अधिक होता है पर उस विस्तार में स्वरों की अनिवार्य भूमिका रहती है। स्वर विस्फारक होते हैं इसलिए वे पुरुष प्रतीक और व्यंजन विस्फारणीय अतएव प्रकृति प्रतीक होते हैं। स्वरों में भी हस्वपुरुष और दीर्घ प्रकृति सूचक होते हैं।
स्वरों का साम्य यदि संख्याओं में देखें तो ज्ञात होगा कि तीन, छः और नौ पुरुष और दो, चार, आठ प्रकृति प्रतीक है। स्वर वर्गों में ऋ और लू को हम नपुंसक मान लें तो वे स्थिर प्रवृत्ति होते हैं अर्थात् वे समभावापन्न पुं और स्त्री की परिणति हैं । अनुस्वार और विसर्ग का एक और पाँच में अंतर्भाव हो जाता है। अनुस्वार नदन क्रिया हैं और विसर्ग परिणाम धर्मिणी प्रकृति का स्वरूप है। तीन, छः और नौ क्रमशः अ, इ, उ में समाविष्ट होते हैं । इस परिकल्पना का व्यावहारिक उदाहरण है कि अकारान्त शब्द पुल्लिंग ही होते है, किंतु इकार अंत वाले शब्द उभयलिंगी होते हैं जिसका तात्विक अर्थ यह है कि त्रिभुज में ऊर्ध्व शीर्ष ही वह स्थल होता है जिसमें से प्रवेश अथवा निर्गम संभव हो पाता है।
दो, चार और आठ दीर्घ आ, ई, ऊ के प्रतीक बनते हैं क्योंकि जहां तीन किसी भी द्वित्व या विभक्ति के प्रभाव से मुक्त है वहीं नौ केवल अपने ही स्वरूप से गुणित हुआ करता है। 3 x 3 = 9 जबकि
छः उभयनिष्ट होता है 3 + 3 = 6 और 3 x 2 = 6 | छः का यही चरित्र इसे त्रिकोण का ऊर्ध्वशीर्ष बिंदु अतएव तीन और नौ के मध्य की स्थिति प्रदान करता है। इस प्रकृति के विपरीत ये युगल संख्याएं हैं जो मुक्त रूप में ही प्रयुक्त होती हैं।
अर्हत् वचन, 23 (1-2),2011