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________________ अर्हत वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर वर्ष - 23, अंक - 1-2, जनवरी-जून 2011, 31-34 अंक विद्या का गणित -अशोक सहजानन्द* सारांश अंकों के व्युत्पत्तिजनक अर्थ, महत्व, उपयोग की चर्चा के उपरांत ज्योतिषीय दृष्टि से अंक विद्या की चर्चा यहां की गई है। संख्या, गणित, अंक जैसे शब्द मात्रा या परिमाण के सूचक हैं किंतु इनका व्युत्पत्ति सिद्ध अर्थ भिन्न है इसलिये ये क्रिया या विधि में अंतर्हित सूक्ष्म अंतर को प्रकट करने वाले शब्द हैं । संख्या का अर्थ होता है सम्यक प्रकार से ख्यान अर्थात् किसी भी मापक को अव्याप्ति-अतिव्याप्ति जैसे दोषों से रहित करके एक नियत निश्चित संकेत से व्यक्त करना। अंक शब्द का अर्थ होता है चिन्ह । प्रकृति के स्वयंप्रभ विस्तार को किसी चिन्ह से व्यक्त करना ही अंक है। संस्कृत में अंक शब्द का गणितीय अथवा संख्यापरक चिन्ह के सूचक के रूप में ही प्रयोग नहीं किया गया है, चिन्ह के अर्थ में भी प्रयोग किया गया है। जैसे-मृगांक, व्रणांक आदि । किंतु कालान्तर में विशेषतया हिन्दी भाषा में अंक शब्द का अर्थ संकोच होता गया और 'अंक' शब्द गणित के संख्यात्मक संकेत में रूढ़ हो गया। गणित शब्द एक प्रक्रिया का सूचक होता है। अंक और संख्या जहां घटकों की नियत अवस्था व परिणाम को सूचित करते हैं वहां गणित उन संख्याओं में हो रही क्रिया को परिभाषित करता है। गणित में गणना है और गणना में गण है । गण का अर्थ होता है-घटक । जिस तरह काल में कलन क्रिया है उसी तरह गणित में गणन क्रिया है और उस क्रिया की परिणतिस्वरूप गणित कहलाता है। जिस तरह अर्थ शब्द से समन्वित होकर एक समग्र प्रवृत्ति परक घटक बनता है वैसे ही आकार का संख्यान, अंक बनता है । संख्याओं का विस्तार नौ तक है किंतु इनके वर्गीकरण में एक, दो, पाँच और सात के ही चार वर्ग बनते हैं। एक का विस्तार तीन, छः और नौ होता है। दो का चार, आठ होता है । छः उभयवर्गीय (अर्थात् द्वित्व और त्रित्व के वर्ग में) है । पाँच शून्य का मध्य है । मध्य और शून्य का अर्थ है कि उद्भव और विनाश की परवर्ती और पूर्ववर्ती अवस्था । पाँच वह स्थिति है जहां उद्भव अपने चरम (विकास) को प्राप्त करता है तद्न्तर विनाश का क्षेत्र प्रारम्भ हो जाता है। संसार का विकास पंचीकरण विधि से होता है । इस विधि में पांच के घटकों की ही मूल भूमिका रहती है। संसार के व्यक्त उपादान पाँच तत्व इसी प्रक्रिया के मूल आधार हैं। सात तन्वतः पाँच के अधिक निकट है। उदाहरण के लिए यह समझ लिया जाय कि जिस प्रकार पाँच तत्वों में तैजस तत्व मध्यमार्गी है, उसी प्रकार सात, पाँच और दस का मध्य है । सात लोक एवं तत्प्रतीक व्याहृतियों में जहाँ पंच तत्वों के स्थूलतम विस्तार के सूचक भूलोक है वहीं सूक्ष्म लोक, महर्लोक और तपोलोक जैसे भी है। तीन और छः का जो विस्तार है उसी में अग्रसर स्थिति नौ आती है जिसमें तीन-तीन से गुणित होता है अर्थात् गण में गुणन क्रिया होती है । संसार चक्र में गति ही प्रकृति है और गति के लिए गणित आवश्यक है। स्थिरता में एकरूपता है उसे गणित की अथवा अंकों और संख्याओं की आवश्यकता नहीं रहती। अंक और संख्याओं की परिणति को गणित कहते हैं । गणित में अंक, बीज और रेखा ये तीन प्रकार आते हैं अर्थात गणित एक प्रक्रिया है क्रिया की सिद्ध अवस्था है। इस साधना को हम अंकों, * प्रधान सम्पादक - 'सहज आनंद' (त्रैमासिक), मेघ प्रकाशन, 239 दरीबांकलां, चांदनी चौक, दिल्ली-110006
SR No.526589
Book TitleArhat Vachan 2011 01 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2011
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size2 MB
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