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________________ करना है तो हृदय की भूमि पर तुम प्रेम के नीर को बहा दो, परंतु किसी के ऊपर पत्थर बनकर मत बरसाओं। प्रिय वाक्य सुनने से हर व्यक्ति पिघल जाता है, संतुष्ट हो जाता है। अरे भाई! किसी से झगड़ो तो भी प्रेम की भाषा में बोलो। जोधपुर (राजस्थान) में जो लोग हैं, झगड़ते हैं तो वे कहते हैं - 'मेरी चरण-पादुका आपके सिर-माथे विराजे।' कितनी सुन्दर भाषा में कितनी मधुर गाली दे डाली। परंतु यदि भेद-विज्ञान की दृष्टि है, तो उदासीन-वृत्ति होना जरुरी है । उदासीन का अर्थ है संसार के भोगों से विरक्ति होना।" हिन्दी साहितय के किसी प्राध्यापक से कोई पूछे कि हिन्दी साहित्य में क्या प्रमुख है। तो वे कहेगें कि - तत्त्व तत्त्व सूरा कही, तुलसी कही अनूठी। बची खुची कबिरा कही, बाकी सब कोई झूठी ॥ इसी प्रकार भेद विज्ञान का सार बताते हुए आचार्य श्री कहते हैं, 'जीव अन्य है, पुद्गल अन्य है, यही तत्त्व का सार है, शेष इसका विस्तार है। आजकल लोग भेद-विज्ञान को भी ब्रान्डेड बना रहे हैं। आप लिखते है कि - मुमुक्षु वही होता है जो संतों को, निर्ग्रन्थों को आम्नायों/पंथों/सम्प्रदायों में नहीं देखता है, वह परमेश्वर को परमेष्ठी में देखता है। इस सूत्र को ध्यान में रखना, चर्म को देखोगे तो व्यक्ति को देखना पड़ेगा और धर्म को देखोगे तो धर्मात्मा दिखेगा।13 जो लोग एअरकंडीशन्ड कमरे में बैठकर स्व एवं पर के भेद ज्ञान की बात करते हैं, उनको संबोधित करते हुए आचार्य श्री कहते हैं कि भो ज्ञानी ! जब कोई खूखार प्राणी तुम्हें भक्षण करने आये उस समय आप चिन्तन करना कि यह देह तो पुद्गल है मैं तो अजर-अमर हूँ, मुझे कौन खा सकता है और दूसरी ओर सुकौशल मुनि को निहारना और कहना, प्रभु ! सारी भूमि रक्त से रंग गई, पर तुम वीतरागता से रंगे बैठे थे। क्या खाया? किसने खाया ? किसको खाया? यह एक भेद विज्ञान है । बस, ज्ञानी और अज्ञानी की यही पहचान है। तुमने शरीर को छीला, मुझे नहीं छीला, यह है अध्यात्म विद्या। क्योंकि अध्यात्म कहता है कि तू शरीर की रक्षा नहीं कर पायेगा, परंतु अपने परिणामों की रक्षा कर सकता है। सुकमाल-सुकौशल मुनिराज अपने शरीर की रक्षा नहीं कर पाये, परंतु ज्ञान-शरीरी आत्मा के परिणामों की रक्षा उन्होंने कर ली। जो जड़ शरीर की रक्षा में लीन है, वह ज्ञान-शरीर की रक्षा नहीं कर पा रहा है । जो ज्ञान-शरीर की रक्षा में लीन है, वह कभी जड़-शरीर की रक्षा कर ही नहीं पायेगा। भो चेतन ! यदि आत्मा का उपकार चाहता है तो आत्मा का उपकार होगा त्याग तपस्या से, पर जिससे शरीर सूखेगा, सो आप सुखाना नहीं चाहते और आत्मा-आत्मा की बात करके भगवान् बनना चाहते हो । कैसे संभव है। ज्ञान-शरीर भेद-विज्ञान या भेद-ज्ञान पर बहुत अधिक बोलने की आवश्यकता नहीं। यह अनुभूति का विषय है, आचरण का विषय है। तत्त्वदेशना कृति भेद ज्ञान को अंतरंग में गहरे तक उतार देने में सक्षम है। भेद ज्ञान को समझे एवं जीवन में उतारे बिना आत्म कल्याण, एवं मुक्ति संभव नहीं है। अतः तत्त्वदेशना अपने जीवन के कल्याण हेतु जरूर पढ़े। विलक्षण प्रतिभा एवं तर्क शक्ति के धनी आचार्य श्री के चरणों में शतशः नमन । अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011 29
SR No.526589
Book TitleArhat Vachan 2011 01 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2011
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size2 MB
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