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आत्मसात करना उतना ही कठिन है। आचार्य देवसेन जी ने तत्त्वसार की 24वीं गाथा में कहा की -
जह कुणइ को वि भेयं पाणिय-दुद्धाण तक्कजोएणं ।
___णाणी वि तहा भेयं करेइ वरझाण-जोएणं ॥ जैसे कोई पुरुष तर्क के योग से पानी और दूध का भेद करता है, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष भी उत्तम ध्यान के योग से चेतन और अचेतन-रूप स्व-पर का भेद करता है।
यहाँ गाथा में सम्पूर्ण वस्तु स्थिति समझना अल्पज्ञ श्रावकों के लिये अत्यन्त कठिन है। इसको समझाते हुए आचार्य श्री विशुद्धसागर जी कहते हैं कि भो ज्ञानी ! भेद-विज्ञान यानि क्या ! मिलावट को मिलावट समझना, वास्तविक को वास्तविक समझना। मिलावट को समझ लिया, उसी का नाम भेद-विज्ञान है। आत्मा में कर्म मिल गये, (जिसने इन दोनों को एक) मान लिया, उसके भेद-विज्ञान का अभाव है। जिसने यह मान लिया कि कर्म भिन्न है, आत्मा भिन्न है-ऐसे अनुभव करता है ज्ञानी ! संसार का जो भ्रमण है, वह मिश्र-अवस्था के कारण ही है। देखों, तिल को पिलना पड़ता है, क्योंकि उसके अन्दर स्निग्धता है। तुम्हें संसार में क्यों रूलना (भटकना) पड़ रहा है। क्योंकि तुम्हारे में राग की स्निग्धता है। भो चेतन ! तेल की चिकनाई तो जल्दी दूर हो जाती है, पर राग की चिकनाई बड़ी प्रबल है। आचार्य भगवान् अमृतचंद्र स्वामी ने 'अध्यात्म अमृत कलश' में कहा है -
भेदविज्ञानतः सिद्धाः सिद्धा ये किल केचन ।
अस्यैवाभावतो बद्धा, बद्धा ये किल केचन ।।131|| जितने जीव आज तक सिद्ध हुए है, वे सभी भेद-विज्ञान (ज्ञान) से हुए हैं और जितने जीव आज बंध रहे हैं, वह भेद-विज्ञान (ज्ञान) के अभाव में बंध रहें हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि पहले वीतराग विज्ञान नहीं होता था। पहले भेद-विज्ञान ही होता था।
आचार्य श्री अपनी बात को स्पष्ट करने में अपने व्यापक अध्ययन का भरपूर उपयोग करते हैं। अभी उन्होंने आचार्य अमृतचंद्र सूरि का उद्धरण दिया, अब आगे वे रत्नकरण्ड श्रावकाचार से उद्धृत करते हैं :
यदि पाप निरोधोऽन्य सम्पदा किं प्रयोजनम्।
अथ पापास्त्रवोऽस्त्यन्य सम्पदा किं प्रयोजनम् ।।27|| यदि पाप का निरोध हो गया है, तो सम्पदा का क्या प्रयोजन है। और पापास्रव जारी है तो सम्पदा से क्या प्रयोजन है। इसी तरह कहा गया है कि -
'पूत सपूत तो क्यों धन संचय, पूत कपूत तो क्यों धन संचय ।'
अर्थात् बेटा सुपुत्र है तो धन जोड़ने से क्या फायदा, वह स्वतः कमा लेगा और यदि वह बेटा कुपुत्र है तो धन जोड़ने से क्या फायदा, वह सब धन बर्बाद कर देगा।
भो ज्ञानी आत्माओं ! भेद-विज्ञान कहता है कि अपने अंदर झांककर देखो, वाणी-संयम पर दृष्टिपात करो। ऐसे वचन मत बोलों जिससे किसी के मर्म पर ठेस पहुँचे क्योंकि गोली का घाव भर सकता है किन्तु बोली का घाव बहुत गहरा होता है। इसलिये वाणी वीणा का काम करे, प्रेम की भाषा का उपयोग करो, प्रेम में आस्था होती है, श्रद्धान होता है। मुमुक्षु जीव किसी को सिर पकड़कर जबरन नहीं झुकाता, वह प्रेम भरी वाणी द्वारा प्राणी के हृदय में परिवर्तन करता है। जिनवाणी कहती है कि हृदय में परिवर्तन
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अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011