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एक यौगिक एसिटीन (C,H,), हाइड्रोजन क्लोराइड से दो पदों में क्रिया करके 1-1 डाइक्लोरोईथेन बनाती है। किन्तु एक पदार्थ बेंजोइक एनहाइड्राइड या ईथर परॉक्साइड की उपस्थिति में क्रिया का स्वरूप बदलकर 1,2 डाइक्लोरो इथेन बनाता है अर्थात् परिस्थितियां परिवर्तित होने पर क्रिया व क्रियाफल परिवर्तित हो गया। इसी प्रकार सब जीवों के साथ तथा विशेषतः यौगिकों के साथ ऐसा ही होता है।
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Acetyleria
Chlossettiere
1-Shielloro-ethane
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12-Dichloroethane इस प्रकार सभी तथ्यों को जोड़ने पर निष्कर्ष निकलता है कि जीव के अपने-अपने कर्म के उदय से उसमें उपस्थित डीएनए की श्रृंखला में Nucleotide में भिन्न-भिन्न प्रकार के बंध होते हैं जो लाखों लाखों प्रकार के हैं, जिनसे प्रत्येक जीव के गुण भिन्न-भिन्न होते हैं।
___णाणाजीवा, णाणा कम्मं णाणा विहि हवे लद्धी।
तम्हा वयण विवादं सजपर समएहिं वज्जिजो | किन्तु इन बंधनों को पुरुषार्थ से परिवर्तित भी किया जा सकता है। वैज्ञानिक इस कार्य में संलग्न हैं, सफलताएं मिल रही हैं और भविष्य में मिलेगीं भी किन्तु बाधा अभी यह है कि कार्माण वर्गणा इतनी सूक्ष्म हैं कि उनका वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से भी देख पाना अभी सम्भव नहीं है। भविष्य के गर्भ में क्या दिया है? इसे जानना अभी कठिन सा है । इस प्रबंध में तीन स्थानों पर रासायनिक प्रतिक्रियाएं देकर यही सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि परमाणु में या उनसे बने यौगिकों में भिन्न-भिन्न रचनाएं बनने या नये प्रकार के बॉन्ड बनने पर किस प्रकार से उनके गुणों में अंतर आ जाता है। इसी प्रकार से भावों से क्रियाओं से कार्माण वर्गणाओं में भी अंतर आता है जिससे औदारिक या वैक्रियिक शरीर की रचना, आकृति तथा संस्कारों में अंतर आ जाता है। अतः अभी वैज्ञानिक अनुसंधान की बहुत आवश्यकता व अपेक्षाएं हैं। संभवतः हम भी इन्हें जानने में समर्थ हो सकें। किंतु इतना निश्चित है कि हमारी क्रियाओं से कैसे-कैसे बंध पड़ते हैं उनका प्रभाव किस प्रकार से व किस प्रकार का होता हे । उनके प्रभाव से बचने का उपाय भी इन्हीं Nucleotide की रचना में छिपा है । इसी तथ्य को वैज्ञानिक दृष्टि से समझकर वैज्ञानिक इनमें परिवर्तन करने में समर्थ हो रहे हैं। नये प्रकार के गुणसूत्रों को कृत्रिम रूप प्रयोगशाला में उत्पत्ति की जा रही है। डीएनए द्वारा कैसे अपना प्रभाव कोशिका को दिया जाता है, यह सभी रहस्य भली भांति जाने जा चुके हैं। अतः हम भी ऐसा आध्यात्मिक प्रयास भी करें कि संसार भ्रमण में अधिक न उलझ पायें तथा जब तक भी संसार में है, निराकुल व सुखी रहें, यह तथ्य ध्यान में रखकर कि ये सभी कार्य हमारे ही द्वारा ही किये गये हैं, किंतु किसी अन्य को या भगवान को दोष न दें।
अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011