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इसी क्रम में (1) व (II) श्रृंखलाओं में एक दूसरे से हाइड्रोजन Bonding के द्वारा संयोग होकर सर्पिलाकार रचना बनती जाती है जिसमें दोनों ओर लाखों-लाखों न्यूक्लिओटाइड होते हैं। अब प्रश्न ये होता है कि डीएनए की इन श्रृंखलाओं का कर्म, कर्मोदय, संस्कार, अनुदय, उपशम आदि से क्या संबंध है ?
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ये डीएनए ही किसी भी जीव के सभी गुणों या स्वभावों को अपने में संचित रखते हैं। माता व पिता के समागम के समय उनके 46 46 गुणसूत्रों में से 1-1 गुणसूत्र लिङ्ग निर्धारित करता है। किन्तु यह लिङ्ग विग्रह गति से आये जीव के वेद के उदय के प्रभाव से गुणसूत्रों के संयोग से बनता है अर्थात् जैसा जीव ने बंध किया था, अब नये भव में उसी के अनुरूप पिता के Y व माता के X के सहयोग से पुरुषवेद तथा पिता के X व माता के X के संयोग से स्त्रीवेद बनता है। शेष जैसे-जैसे कर्म के अनुरूप Nucleotides में नाइट्रोजन व हाइड्रोजन एटम में हाइड्रोजन Bonding बनती है या नहीं बनती अर्थात् सभी 148 में से 145 कर्म प्रकृतियों के अनुरूप ही बन्ध होता है। जो प्रकृति उदय में नहीं आती है, वह बंधन युक्त होने से उदय में नहीं आती अर्थात् डीएनए की रासायनिक संरचना में दबाती है तथा जो उदय में आनी है, उसको प्रगट करने वाला परमाणु या अभिलाक्षणिक समूह बंधन से मुक्त रहता है।
इस प्रकार किसी भी जीव में उपस्थित कोशिका के डीएनए की रचना से यह ज्ञात किया जा सकता है कि इसमें किस प्रकार की Bonding होने से कौन सा संस्कार उत्पन्न होगा और कौन नहीं। वैज्ञानिक आजकल इन्हीं की रचना व खोजों में संलग्न हैं जिनमें बहुत से ऐसे जीन की पहिचान कर ली गयी है और की जा रही है, जो किसी रोग या अन्य प्रभाव के लिए उत्तरदायी हैं। उनकी रचना को परिवर्तित करके उसके पहिले प्रभाव को समाप्त व अन्य उत्तम प्रभाव को क्रियाशील बनाया जा सकता है।
अर्थात् निष्कर्ष यह आया कि किसी जीव के मरण के पश्चात नये भव में जाते समय माता व पिता के वे वे गुणसूत्र, डीएनए आदि क्रियाशील होंगे, अर्थात् उनकी रचना में उपस्थित Nucleotide क्रियाशील होंगें जैसे गुण, स्वभाव, रचना, आकृति, संस्थान, संहनन आदि उसके कर्मोदय के कारण बनेंगे ।
उदाहरण के लिये माना किसी जीव को इस भव में कोई रोग जैसे मधुमेह है तब उसकी माता द्वारा प्राप्त गुणसूत्र में मधुमेह उत्पन्न करने वाला डीएनए है तथा जीव के अशुभ कर्म के उदय के कारण यह रोग उसे हो गया। माता के और दूसरे पुत्र-पुत्रियों में भी वह गुणसूत्र आ सकता है और नहीं भी। यदि नहीं आया, तब रोग नहीं होगा। किन्तु यदि वह गुणसूत्र इस रोग के लिये उत्तरदायी रचना को लेकर आया, तब यह सम्भव है कि उस जीव के शुभ कर्म के उदय से उसके सम्पूर्ण आयुकाल में वह उदय में ही ना आये, अर्थात् सत्ता में रहते हुए भी उदय में न आये, यहीं अनुदय अवस्था है। इसी कारण कुल 148 कर्म प्रकृतियों में 3 कर्म प्रकृतियों (तीर्थंकर, आहारक शरीर व आहारक अंगोपांग) एवं शेष 145 सत्ता में रहती हैं, किंतु Nucleotide की रचना में वे Boding को प्राप्त हो जाने से भी उदय में नहीं हैं।
जैन दर्शनानुसार साधक / श्रमण अपने पुरुषार्थ, तप, यम, नियम, संयम, भावविशुद्धि आदि के कारण ऐसी अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं कि कर्म प्रकृति में उत्कर्षता, अपकर्षता, उपशम, संक्रमण व उदीरणा तथा काण्डक घात आदि के द्वारा उन्हें अप्रभावी कर देते हैं। यहां फिर प्रश्न उठता है कि क्या इन कार्यों के द्वारा अर्थात् इस ऊर्जा के द्वारा यह परिवर्तन सम्भव है ? एक और रासायनिक प्रतिक्रिया से इसे समझाया जा सकता है।
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अर्हतु वचन 23 (1-2), 2011