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________________ जीवन के हर कार्य में संयम आवश्यक : आचार्य विद्यानन्द मुनि समेतपिकाचार्यश्री विशानन्द जी मुनिराज की 7वीं जन्मजयन्ती ओवन्द पुरस्कार प्राचार्य पार्श्वदेव पुरस्कार परमपूज्य श्वेतापिच्छाचार्यश्री विद्यानन्दजी मुनिराज, ससंघ के पावन सान्निध्य में पुरस्कार-समारोह पुरस्करणीय विद्वान् श्री धन्यकुमार श्रीवर्मा जैनी एवं श्री सतीश जैन (आकाशवाणी) दिल्ली सिद्धान्तचक्रवर्ती, श्वेतपिच्छाचार्यश्री विद्यानन्दजी मुनिराज ने ग्रीनपार्क में आयोजित एक विशाल सभा में प्रवचन करते हुए कहा कि 'अनादिकाल से भारत धर्म प्रधान देश रहा है संतों का उपदेश मानवमात्र के कल्याण के लिए होता है। वे तो सभी को गंगा की तरह शीतलता प्रदान करते हैं। जो जीवन को मंगलमय बनाए, वहीं धर्म है। अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है। अहिंसा का पालन संयम से ही होता है, इसलिए जीवन के हर कार्य में संयम आवश्यक है। सभा का आयोजन परमपूज्य आचार्यश्री की 87वीं जन्म जयंती पर जैन सभा युसुफ सराय, ग्रीनपार्क, नईदिल्ली ने कुन्दकुन्द भारती न्यास द्वारा प्रवर्तित पुरस्कार समर्पण समारोह के उपलक्ष्य में किया था। __ इस अवसर पर जैन सिद्धांतों के अध्ययन-अध्यापन, प्रचार-प्रसार एवं अनुसंधान हेतु सेठ नेमचन्द एवं श्रीमती शांतिदेवी जैन की स्मृति में प्रवर्तित आचार्य नेमिचन्द्र पुरस्कार श्री सतीश जैन (आकाशवाणी) दिल्ली को शॉल, माल्यार्पण, प्रशस्ति पत्र, स्वर्ण पदक के साथ समाजरत्न की उपाधि से विभूषित किया गया तथा डी.सी. जैन फाउण्डेशन द्वारा प्रवर्तित आचार्य पार्श्वदेव पुरस्कार धन्यकुमार श्रीवर्मा जैनी (सोलापुर) को शॉल, माल्यार्पण, प्रशस्ति-पत्र, स्वर्ण पदक के साथ साहित्य शिरोमणि की उपाधि से विभूषित किया गया। आचार्यश्री ने कहा कि विद्वान ही दुनिया को रास्ता दिखाते हैं । राजा तो केवल अपने देश में परंतु विद्वान सर्वत्र पूजे जाते हैं। समारोह की अध्यक्षता करते हुए श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ के कुलपति प्रो. वाचस्पति उपाध्याय ने कहा कि आचार्यश्री ज्ञान के भंडार है। ये तो भगवान महावीर की वाणी को गन्ने के रस की तरह पिलाते है। सभा में पूज्य उपाध्याय श्री प्रज्ञसागरजी, पूज्य गणिनी आर्यिकाश्री विद्याश्री माताजी, क्षुल्लकश्री विभंजनसागरजी, मूडबिद्री के भट्टारकश्री चारुकीर्तिजी, नांदणी मठ के भट्टारक पूज्यश्री जिनसेनजी आदि उपस्थित थे। श्रीमती शरयू दफ्तरी ने 'स्वानन्द विद्यामृत' (भाग 5) का लोकार्पण किया एवं हिन्दी जैन बोधक के संबंध में अपने विचार व्यक्त किए। सभा संचालन डॉ. वीरसागर जैन एवं आभार समाज के अध्यक्ष श्री रमेश चन्द जैन ने किया। नए ग्रंथों 'जैनधर्म का सरल परिचय' व 'रयणसार' का लोकार्पण भी किया गया। 132 अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011
SR No.526589
Book TitleArhat Vachan 2011 01 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2011
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size2 MB
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