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________________ प्रसंग : ऋषभदेव जयन्ती संवेदनशीलता के लिए स्याद्वाद जरूरी है - पूज्य आचार्य विद्यानंद मुनिराज श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली के जैन दर्शन विभाग में 'स्याद्वाद' पर एक दिवसीय राष्ट्रीय गोष्ठी स्याद्वाद बोलने की कला का नाम है, यह सत्य तक पहुंचने का मार्ग है। मनुष्य में संवेदनशीता के लिए स्याद्वाद जरूरी है। स्याद्वाद हमें सिखाता है कि जैसे आपको बोलने का अधिकार है वैसे ही दूसरों को भी बोलने का अधिकार है। उक्त विचार सिद्धांत चक्रवर्ती आचार्य विद्यानन्द मुनिराज ने जैन दर्शन विभाग द्वारा श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ (मानित विश्वविद्यालय), नईदिल्ली में आयोजित, 'भारतीय चिंतन में स्याद्वाद' विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह में भारतीय दर्शन के मर्मज्ञ मनीषियों को संबोधित करते हुए व्यक्त किये। उदघाटन समारोह में संगोष्ठी के अध्यक्ष तथा विद्यापीठ के कुलपति प्रो. वाचस्पति उपाध्याय ने आचार्य समन्तभद्र की वादार्थी विचराम्यहम् नरपते शार्दूलविक्रीडितम्' पंक्तियों को उदधृत करते हुए अनेकान्त-स्याद्वाद पर उनके योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि मुझे सप्तभंगी-सप्तरंगी इन्द्रधनुष की तरह प्रतीत होता है जो अपनी छटा बिखरते हुए एक दिशा को दूसरी दिशा से जोड़ता है। इसी तरह 'अनेकांत तथा स्याद्वाद' एक गम्भीर विषय है जिसका अध्ययन दर्शन के सभी विद्वानों को अवश्य करना चाहिए। मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए वरिष्ठ मनीषी महामहोपाध्याय प्रो. दयानन्द भार्गव ने कहा कि हमने 'अनेकांत' जैसे गम्भीर विषय को मात्र एक सम्प्रदाय से जोड़कर बहुत संकीर्ण कर दिया है। उन्होंने अनेकान्त की व्यापकता' विषय पर बोलते हुए अनेक उद्धरणों द्वारा यह सिद्ध किया कि प्रायः सभी भारतीय दर्शन अलग-अलग तरीकों से 'अनेकांत' का ही प्रयोग कर रहे हैं। विषय प्रवर्तन करते हुए संगोष्ठी के संयोजक तथा जैनदर्शन विभाग के अध्यक्ष प्रो. डॉ. वीरसागर ने कहा कि स्याद्वाद जैनदर्शन का प्राण है, बिना स्याद्वाद के जिनागम में एक भी शब्द नहीं कहा गया है। हमें उदार भावना से स्याद्वाद को समझने का प्रयास करना चाहिए। उद्घाटन सत्र का संचालन करते हुए जैन दर्शन विभाग के सहायक आचार्य डॉ. अनेकांत जैन ने कहा कि यह प्रसन्नता की बात है कि दर्शन संकाय तथा अन्य संकायों के लगभग दो दर्जन विद्वान जो स्वयं भारतीय दर्शन की अलग-अलग शाखाओं में मर्मज्ञ मनीषी है, एक माह से स्याद्वाद को समझने का प्रयास कर रहे हैं, उन्हें स्याद्वाद विषयक अनेक साहित्य विभाग द्वारा उपलब्ध करवाया गया है। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. कुलदीप ने किया। प्रथम सत्र की अध्यक्षता दर्शन जगत के मूर्धन्य मनीषी भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सिद्धेश्वर भट्ट ने की। इस सत्र में प्रमुख वक्ता जोधपुर विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो. धर्मचन्द जैन ने 'स्याद्वाद पर लगने वाले दोषों का परिहार' विषय पर अपना व्याख्यान दिया। जोधपुर विश्वविद्यालय में दर्शन विभाग के आचार्य डॉ. राजकुमार जैन तथा साहित्य-संस्कृति संकाय प्रमुख प्रो. सुदीप जैन ने स्याद्वाद के सैद्धांतिक पक्ष को सभी के समक्ष रखा। विशिष्टाद्वैतवेदान्त विभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष प्रो. केदार प्रसाद परोहा ने 'विशिष्टाद्वैतवेदान्त और स्याद्वाद' पर अपने महत्वपूर्ण विचार रखे। प्रथम सत्र का संचालन डॉ. अनेकांत जैन ने किया। द्वितीय सत्र की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग की आचार्य एवं अध्यक्ष सुप्रसिद्ध दार्शनिक प्रो. शशिप्रभा कुमार ने की। मुख्य वक्तव्य जैनविश्व भारती विश्वविद्यालय, लाडनूं के जैन विद्या विभाग के आचार्य दामोदर शास्त्री ने दिया। द्वितीय सत्र का संचालन प्रो. वीर सागर जैन ने किया। संगोष्ठी के संयोजक प्रो. वीरसागर, सह संयोजक डॉ. अनेकांत, डॉ. कुलदीप ने संगोष्ठी की प्रचलित विधाओं से हटकर कुछ नये प्रयोग किये जो सफल रहे। विद्वानों ने ऐसी संगोष्ठियां बार-बार आयोजित करने की प्रेरणा दी। संगोष्ठी का समापन सत्र कुन्दकुन्द भारती के प्रांगण में पूज्य आचार्य विद्यानन्द मुनिराज के सान्निध्य में होने से संगोष्ठी की गरिमा और अधिक बढ़ गयी। समापन सत्र का संचालन श्री सतीश जैन, आकाशवाणी ने किया। अर्हत् वचन, 23 (1-2),2011 131
SR No.526589
Book TitleArhat Vachan 2011 01 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2011
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size2 MB
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